Tuesday, December 27, 2011

कल रात ...

चाँदनी उस बात से अंजान थी
जुगनू भी उस हालात से थे बेखबर
के दूर चिलमन पे कोई शम्मा जली
कल रात भर ठहरी रही जिसपे नज़र ...

उन श्वेत किरणों ने दिए को जब छुवा
उठने लगी चिंगारियों की इक लहर
उस लौ से होके थी गुज़रती जो हवा
कहती थी अब तूफ़ान लायेंगे इधर ...

जो चाँद को देखा किये आकाश में
समझेंगे आखिर क्या मेरा हाल - -जिगर
जो रूप आँखों में उतर आया मेरे
दीवानगी सा कर रहा मुझपे असर ...

कुछ पल को थी जिन्दा हुई ये ज़िन्दगी
इक राह पर जब था मिला वो हमसफ़र
के दूर चिलमन पर कोई शम्मा जली
कल रात भर ठहरी रही जिसपे नज़र ...


-ऋषि चन्द्र

Friday, November 25, 2011

आस में

खिलखिलाते
दौड़ते तितली के पीछे बाग़ में
हमने पतंगों के लिए मंझे बनाये धाग में
माटी उड़ी, पत्थर चले, दो फल गिरे, ले कर चले
धूल में कंकर मिला दी और पानी आग में ...


गन्ने चुराए खेत से माली भी चिल्लाता रहा
उसको दिखा के मैं अंगूठा दूर से हँसता रहा
बिल्ली को उसदिन फिर भगाया था शहर में दूर तक
फिर छांव में इक पेड़ के मैं बेखबर सोता रहा


चीटियों की पंक्तियों के साथ मैं जाता रहा
कोयल की कू-कू संग उसके राग में गाता रहा
आंटे की गोली मछलियों को डाल दी तालाब में
फिर किनारे बैठ कर मैं भी वही खाता रहा


पंछियों के साथ मैं उड़ता रहा आकाश में
रौशनी मद्धिम , नमी आने लगी थी घास में
दीपक जले सुन आरती की गूँज मैं वापिस चला
तुलसी के पत्तों के लिए होगी मेरी माँ आस में ...


-ऋषि चन्द्र

Wednesday, November 2, 2011

अमर-प्राण

अग्निवर्षा में भीग-भीग
कतरा-कतरा बह जायेगा
रोम -रोम तक झुलस -झुलस कर
रक्तहीन हो जायेगा
अंतहीन सागर का जैसे
लहर-लहर लड़ जाएगा
छीन-छीन कर यम से ही
मृत्यु अपनी हर लायेगा
निखर-निखर उठ्ठेगी भूमी
नहा-नहा शव आएगा
दूर-दूर तक शत्रु का भ्रम
चूर-चूर हो जायेगा
अंधेर नगर अंगारों से ही
दीप्तमान हो जाएगा
शंखनाद से दिशा-दिशा
गुंजायमान हो जायेगा
बीतेगा ऐसे प्रहर-प्रहर
जो कीर्तिमान बन जाएगा
महावीर
मरते-मरते जब
अमर -प्राण बन जाएगा....


- ऋषि चन्द्र

Friday, October 21, 2011

गदहों का कुत्ता 


सुनो  सुनो  ओ  भाई !
गरम  गरम  है  मुद्दा
अभी  अभी  देखा  है  मैंने
गदहों  का  इक  कुत्ता ! 
देख  हुई  हैरानी
राज़  फास  की  ठानी...
कुछ  भी  ना  सूझा
तो  डर  डर  कर  पूछा
ओ  कुत्ते  बलवान !
है  किस  उलझन  में ?
आकर  बैठ  गया  है  कैसे
गदहों  के  घर  में ?

वो  बोला- क्या  बोल  रहा  है!
उलझन  की  क्या  बात
मैं  गदहों  का  हूँ  कुत्ता 
तो जाऊं किसके साथ ?
मैं  बोला- छोड़ो  ये  बातें
लगते  हो  चालाक
पर  गदहों  के  घर  ना  देखा
कुत्ते  देखे  लाख...


वो  बोला- ओ  हीरो !
रख  ज़मीन  पर  पैर
तुम  जैसे  ऐरे-गैरे  से 
करता भी  ना  बैर...
जो  बोझ  उठाता है  तेरा
चुपचाप  जो  सहता  हर  पीड़ा 
ऐसे  बलिदानी  को  कहते
तुम्हें  मूर्ख  लाज  ना  आती ?
तुम  रोटी  रखो  अपनी
मुझे  इज्ज़त  मेरी  प्यारी  
और  अधिक  भड़काने  की
जुर्रत  ना  करना  मुझको
देख  तेरे  नौकर  का  नौकर
काट  ना  खाए  तुझको...


दांत  देख  कर  पैने-पैने
प्राण  पखेरू  फुर्र
और  निर्दयी  दिखा-दिखा  के
करता  था  गुर-गुर्र
खीच  कंठ  में  प्राणवायु
मैंने  बोला- भगवान् !
ओ अद्भुत  ज्ञानी  महान !
क्षमा  करो  और  धन्य  करो 
दे  कर  के  ये  वरदान
इस  अबोध  के  घर  में  भी
कुत्ता  महाराज  पधारें
भोग  लगाकर  मनचाहा
अपने  उपदेश  सुनावें...


गुर्रा कर बोला-  भाँव-भाँव
भागो  सर  पे  रख  पाँव
बातें  करो  ना  टेढ़ी  मेढ़ी 
और  ना  फेंको  दाँव... 
मालिक पर  मेरे  मुझको
अब  होता  है  अभिमान
शर्म  नहीं  आती  के  मुझको
पाल  रहा  इंसान...
दिखती  है  तुझमे  ना  कोई
गदहों  वाली  बात
मैं  गदहों  का  कुत्ता 
जाऊंगा  क्यूँ   तेरे  साथ? ...


मैं  निरास  घर  आते-आते
खुद  से  पूछ  रहा  था...
क्या  हमसे  बेहतर  वो  उन
गदहों  को  बता  रहा  था ?
क्या  मेरे  ही  नाम  को  वो
गाली  सा  सुना  रहा  था ?
क्या  मेरे  वजूद  पर  वो  
प्रश्नों  को  उठा  रहा  था ?...
शायद  मेरा  भ्रम  था
या  सपना  था  कोई  भद्दा...


क्या  सच  भी  हो  सकता  है
गदहों  का  ये  कुत्ता !!....??


- ऋषि चन्द्र 

Tuesday, October 18, 2011

आँधी

मैं  कहीं  चुपचाप  सहमा  सा  खरा  था,
तभी  इक  बदलाव  की  आँधी  चली  थी,
वक़्त  के  धागे  फिसलते  जा  रहे  थे ,
और ,लहराना  बदन  की  बेबसी  थी ...

धूल  आँखों  में  लिए, सपने  दफ़न  कर ,
शामिल  हुई  इस  होड़  में  हर  ज़िन्दगी  थी,
अंजान  राहों  में  मिले  थे  लोग  ऐसे ,
के, दुश्मनों  से  ही,  हमारी  दोस्ती  थी ...
फँस  गए  ऐसे  थे  अंधर  में  परिंदे ,
के  लुट  गयी  पंखों  की  वो  आवारगी  थी ,
और  मकसद  भी  बदलते  जा  रहे  थे ,
रुख  हवा  जैसे  बदलती  जा  रही  थी ...
हाँ ,खो  गया  मेरा  बहुत  कुछ  है  मगर ,
कब , कहाँ,  मेरी  कोई  मर्ज़ी  चली  थी ,
मैं  कहीं  चुपचाप  सहमा  सा  खरा  था ,
तभी  इक  बदलाव  की  आँधी चली  थी...

Thursday, October 6, 2011

भूल  

भूल  है  तुझसे  ये  मेरी  दिल्लगी ,
के  दिल  पे  तेरे  और  कोई  नाम  है ,
फिर  भी  क़यामत  तक  चलेगा  सिलसिला ...
बाँकी  बचा  क्या  दिलजले  को  काम  है ?

इज़हार  कर  कैसे  मैं  ग़म  दे  दूँ  तुझे ,
न  इश्क  इतना  भी  बेगाना  है  मेरा ,
तुझको  खबर  ये  उम्र  भर  होगी  नहीं ,
के  और  भी  कोई  दिवाना  था  तेरा...

अक्सर  तुम्हारी  याद  आएगी  मुझे ,
अक्सर  तुम्हे  भी  आएगी  कुछ  हिचकियाँ ,
यूहीं  हँसी सजती  रहेगी  होंठ  पर  ,
चुपचाप  ही  खिंचती  रहेगी  सिसकियाँ...

लहरों  में  बहने  के  लिए  तैयार  हूँ ,
अब  डूबने  से  दिल  कहाँ अंजान  है ,
घाव  के  दुखने  में  अब  है  क्या  मज़ा ,
दर्द  जब  नासूर  का  बदनाम  है ...

भूल  है  तुझसे  ये  मेरी  दिल्लगी ,
के  दिल  पे  तेरे  और  कोई  नाम  है ,
फिर  भी  क़यामत  तक  चलेगा  सिलसिला...
बाँकी  बचा  क्या  दिलजले  को  काम  है ?


-ऋषि चन्द्र 

Thursday, September 29, 2011

पतली  गली  से

दुकानों  में  यूँ  आग  लगते  रहे  तो 
लकरी  कुतर   के  भी  खाना  पड़ेगा  
पानी  को  वाटर  न  कह  कह  के  बेचो 
के  नाली   में  गोता   लगाना  पड़ेगा 
खुले  चोंच   कितने  हैं  दाने  मगर  दो 
रिश्ता  भी  उसमे  निभाना  पड़ेगा 
ठसमठस है  चारों  तरफ  हाल   भैया  
के  पतली  गली  से  ही  जाना  पड़ेगा 

कभी  शौकिया   भी  जो  बाज़ार  निकले ,
खरे  रोंगटों  को  सुलाना  पड़ेगा ,
खातिर  की  ज्यादा  तलब  जो  हुई  तो ,
नंगे  बदन  मार  खाना  पड़ेगा ,
कल  रात  खम्भे  से  जोड़ा   था  टांका ,
फिर  से  किसी  को  चढ़ाना  पड़ेगा ,
ठसमठस है  चारों  तरफ  हाल   भैया  
के  पतली  गली  से  ही  जाना  पड़ेगा


अगर  यार  की  याद आने  लगेगी ,
तो  बटुआ  वो  पहले  छुपाने  लगेगा ,
के  लगता  है  अब  भीख  देने  के  बदले ,
भिखारी  का  डब्बा  उड़ाना  पड़ेगा ,
इंजन  बिना  तो  चले  ही  थे  पैदल ,
अब  इंधन  का  खर्चा  बचाना  पड़ेगा 
ठसमठस है  चारों  तरफ  हाल   भैया  
के  पतली  गली  से  ही  जाना  पड़ेगा...  


कर  देंगे  घटना  कोई  दिन  दहाड़े,
गुज़ारे  का  मुमकिन  बहाना  मिलेगा 
लगा  हथकड़ी  ले  के  जाएँ  बड़े  घर ,
तो फ़ोकट का खाना खज़ाना  मिलेगा ,
कब तक युं ही नल की टप टप चलेगी,
बूंदों से कब तक नहाना पड़ेगा,
ठसमठस है  चारों  तरफ  हाल   भैया  
के  पतली  गली  से  ही  जाना  पड़ेगा


लकीरों  के  बदले  दरारें  बनी  हो ,
तो ज्योतिष को भी सिर झुकाना पड़ेगा,
कहे भी तो क्या चन्द्र, जब हाल ये है,
के ग़म भी हँसा के सुनाना पड़ेगा,
तुम्हे तो सुना ही दी अपनी कविता ,
अब  नया  कोई  मुर्गा  फ़साना  पड़ेगा,
ठसमठस है  चारों  तरफ  हाल   भैया  
के  पतली  गली  से  ही  जाना  पड़ेगा


- ऋषि चन्द्र 











Monday, September 5, 2011

साँसों के चलने के लिए

फूलों से रंजिश हो गई,
पर बदनसीबी देखिये,
दरकार खुशबू की रही,
साँसों के चलने के लिए...

नियत की भी पहचान
ऐ रश्म-ऐ-मोहब्बत देखते,
भँवरों से रिश्ता कर लिया,
पत्तों को जलता छोड़ के,
धोखे ही धोखे बाग़ में,
हर पौध में, हर डाल में,
खुश है मेरा दिल आज उन,
दश्तों के बंजर के लिए...
फूलों से रंजिश हो गई,
पर बदनसीबी देखिये,
दरकार खुशबू की रही,
साँसों के चलने के लिए...

रौशनी तो रौशनी,
अंधेरों में भी खिल रहे,
जो हैं नहीं दिल के जले,
महफूज़ वो कैसे रहे,
देखे हैं बस्ती में कई,
चिंगारियां उड़ते हुए,
पूछोगे ज़न्नत का पता,
कह देंगे मरने के लिए...
फूलों से रंजिश हो गई,
पर बदनसीबी देखिये,
दरकार खुशबू की रही,
साँसों के चलने के लिए...

काफिर कहा,पागल कहा,
कितनी महारथ मिल गई,
मंजिल बिना ही रास्तों की,
शहंसाहत मिल गई,
मुझसे हवाओं ने कहा,
ऐ हमसफ़र, तू कौन है?
मैंने कहा के, साथ चल,
पहचान करने के लिए...
फूलों से रंजिश हो गई,
पर बदनसीबी देखिये,
दरकार खुशबू की रही,
साँसों के चलने के लिए...

ऐ फूल तेरे रंग का,
ये ढंग कैसा है बता,
छिल गई चमरी मगर,
उतरा नहीं जो चढ़ गया,
ये खेल इतनी दूर तक,
लाकर, हराया क्यूँ मुझे,
जब एक ही थी चाल काफी,
मात करने के लिए...
फूलों से रंजिश हो गई,
पर बदनसीबी देखिये,
दरकार खुशबू की रही,
साँसों के चलने के लिए...

-ऋषि चन्द्र

Sunday, September 4, 2011

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ

आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्म-ओ-रहे दुनिया ही नीभाने के लिए आ
किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से खफा है तो ज़माने के लिए आ
कुछ तो मेरे पिन्दार-ऐ-मुहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ
एक उम्र से हूँ लज्ज़त-ऐ-गिरिया से भी महरूम
ऐ राहत-ऐ-जान मुझ को रुलाने के लिए आ
अब तक दिल-ऐ-खुशफहम को तुझ से हैं उम्मीदें
ये आखिरी शम्में भी बुझाने के लिए आ
माना की मुहब्बत का छिपाना है मुहब्बत
चुपके से किसी रोज़ जताने के लिए आ
जैसे तुझे आते हैं न आने के बहाने
ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए

-
अहमद फ़राज़

Wednesday, August 31, 2011



डगमगाते होंगे शायद ये कदम,


पर नाचने उस जस्न में हम आयेंगे,


जब कुछ घरी होगी ज़नाज़े को मेरे,


कंधे पे हम डोली तेरी ले जायेंगे...




Monday, August 29, 2011

क्या कम हुआ?

दुश्मन बना बैठे, दीवाने को अगर, तो क्या हुआ
रिश्ता कोई कायम हुआ, इतना करम, क्या कम हुआ?

अपना पता, उनकी खबर में, भूलने लगते हैं हम,
उनकी झलक पे, साँस अपनी, रोकने लगते हैं हम,
जो फेरते हैं देख कर, हमसे नज़र, तो क्या हुआ,
इक बार का दीदार भी, नाचीज़ को, क्या कम हुआ?

आजकल चर्चों को, मेरे आबरू की भूख है,
सुना है के उन लतीफों में, मसाला खूब है,
लाखों ठहाकों ने, किया हमपर कहर, तो क्या हुआ,
उनकी हँसी का भी, मिला तोहफा हमें, क्या कम हुआ?

हासिल नहीं वो हो सके, हासिल हमें जिसने किया,
मुमकिन नहीं के छूट जाये,जो नशा हमने किया,
आँचल में उनके, ग़म कभी, भूले नहीं तो क्या हुआ,
शोहरत कफ़न पाएगी, उनके नाम से, क्या कम हुआ?

दुश्मन बना बैठे, दीवाने को कोई, तो क्या हुआ
रिश्ता कोई कायम हुआ, इतना करम, क्या कम हुआ?

-ऋषि चन्द्र

Tuesday, August 23, 2011

काश!

फिर से तलाश करता मंजिल,
फिर से राहें ढूँढा करता,
इक रोज़ कहीं चलते चलते,
काश! अगर मैं खो जाता...

काश! के मेरे हाथों से,
कुछ बनी लकीरें मिट जाती,
काश! के मेरे माथे की,
ये शिकन कहीं जा छिप जाती,
जो दफन हो गया है मुझमे,
वो राज़ उजागर हो जाता,
इक रोज़ कहीं चलते चलते,
काश अगर मैं खो जाता...


काश! वक़्त फिर से चुनाव का,
अवसर मुझको दे देता,
काश! वो सपने आँखों में,
मैं छीन के फिर से ले आता,
आज़ाद समंदर के रस्ते,
तालाब का पानी चल पड़ता,
इक रोज़ कहीं चलते चलते,
काश अगर मैं खो जाता...

फिर से तलाश करता मंजिल,
फिर से राहें ढूँढा करता,
इक रोज़ कहीं चलते चलते,
काश अगर मैं खो जाता...

- ऋषि चन्द्र

Saturday, August 20, 2011

देखें कब तक जीते हैं

इक ज़ख्म छुपा है सीने में,
और ज़हर उसी का पीते हैं,
मौत की ख्वाइश हमें नहीं,
पर,देखें कब तक जीते हैं...

मैखाने कैसे छोर दिए,
पूछो मत यूँ नादानी से,
पीते भी क्या हम बतलाओ,
जब नशा हो रहा पानी से

बेकल मन की आवाजों को,
करती धड़कन आज़ाद नहीं,
तिल तिल हरदिन लुटते लुटते,
हो जाऊं न बर्बाद कहीं

मोहताज नहीं इस वक़्त के हम,
वो बीतेंगे वो बीते हैं,
मौत की ख्वाइश हमें नहीं,
पर देखें कब तक जीते हैं

-ऋषि चन्द्र

Wednesday, August 17, 2011

भगवान भी मजबूर होता है

जब धज्जियाँ कानून की, कानून करता है,
औलाद जब माँ बाप का ही, खून करता है,
जब रात दिन से भी अधिक, मशहूर होता है,
ऐसे में फिर भगवान भी, मजबूर होता है।

प्यास बुझती है नहीं जब, रक्त पी के भी,
चीख, सन्नाटों को, हर दिन भंग करती है,
हँसते हुए जो, मौत से भी इश्क कर बैठे,
जब ऐसे वीरों की गली, बेरंग रहती है,
जब गद्दार होना बन चुका, दस्तूर होता है,
ऐसे में फिर भगवन भी, मजबूर होता है।

फायदा, जब प्यार को भी, तोलने लगता,
जब आँसुओं के मोल, धन पहचान लेते हैं,
कहते हैं हम, है आदमी से, जानवर बेहतर
और, खुद को बेहतर बाँकियों से, मान लेते हैं
मूर्खता में मूर्ख, जब मगरूर होता है,
ऐसे में फिर भगवान् भी मजबूर होता है


धर्म जब जब बस यूँही, निःशब्द रहता है,
तब तब विनाशक लेख इक, प्रारब्ध लिखता है,
परवाह जब होती नहीं, अल्ल्हड़ जवानी को,
हर डूबते से एक तिनका, छूट जाता है
जब सत्य सुनना, कान नामंजूर करता है,
ऐसे में फिर भगवान् भी मजबूर होता है.

-ऋषि चन्द्र

Monday, August 15, 2011


ये बारिश


रिमझिम फुहारें बरसने लगी हैं,
मौसम भी करवट बदलने लगी है,
फिर से बनाकर मुझे आज ज़रिया
कागज़ से श्याही लिपटने लगी है।
फूलों पे बूँदें बजाती हैं सरगम,
कलियाँ भी खिलने को आने लगी हैं,
ऐसी नशीली बरसती है बारिश,
के नदियाँ भी इनमे नहाने लगी हैं।
हवा तेज थी जो अभी थम गयी है,
किरणों की इन्द्रधनुष बन गयी है,
विहग चहचहाते हुए फिर रहे हैं,
माटी से भीनी सुगंध उठ रही है,
चलना कदम दो कदम भी कठिन है,
सिहरन बदन में समाने लगी है,
बमुश्किल,मुझे अब यकीं हो रहा है,
के लेखक पुराना, लिखावट नयी है।
चाहे अधूरी उमर या समझ हो,
मगर अब ये सावन लुभाने लगी है,
फिर से बनाकर मुझे आज ज़रिया,
कागज़ से श्याही लिपटने लगी है।।

- ऋषि चन्द्र

Wednesday, August 10, 2011

डरती जवानी है नहीं

यूँ तोड़ दें चट्टान, के छोरें निशानी तक नहीं,
ये खून पानी है नहीं, डरती जवानी है नहीं।

हाले-बदन क्या देखता है, देख जज्बे को मेरी,
नस्ल आदम का मगर, है आग नस-नस में मेरी,
बुझता सितारा है नहीं, बहता किनारा है नहीं,
कट कर गिरे कितने यहाँ, झुकता पताका है नहीं।

बातें बेमानी ये नहीं, झूठी कहानी ये नहीं,
ये खून पानी है नहीं, डरती जवानी है नहीं।

धिक्कार है! उस आग को, तूफ़ान में जो बुझ गयी,
आंधी जलाता हूँ लपट से, देख पागलपन मेरी,
मंदिर गिरे, मस्जिद गिरे, किसने किया ये, कौन हैं?
आ सामने ! अब गोद सूनी, मेरे माँ की है नहीं।

नरसिंह की दहाड़ है, ये थरथराती है नहीं,
ये खून पानी है नहीं, डरती जवानी है नहीं।

संघर्ष मेरी ज़िन्दगी है, मौत मेरी प्रीत है,
हार कर भी जीत जाना, वीरता की रीत है।
फक्र जो खुद पर रहे, मैली गरेबां हो नहीं,
तो चार कन्धों की भी हसरत, इस ज़नाज़े को नहीं।

जो तीर निकले बाण से, भेदे बिना रुकता नहीं,
ये खून पानी है नहीं, डरती जवानी है नहीं।

-ऋषि चन्द्र

Saturday, August 6, 2011

गँवारी होगी

दवा मर्ज़-ऐ-ग़म की , तेरी दोस्ती ने,
दिलो जान से कब, पिलाई न होगी,
हमें दोस्तों के,बिना जिंदगानी ,
गँवारी न है और, गँवारी न होगी।

मुझे तुमने पर देके ,उड़ना सिखाया,
कभी रोते-रोते भी हँसना सिखाया,
है चलना तेरे संग आसान कितना,हो
डगर लाख मुश्किल, खुदा ने बनाया,

हमारे लिए, हो के बेचैन, रातें,
रो-रो के तूने, बितायी भी होगी,
हमें दोस्तों के बिना जिंदगानी,
गँवारी न है और, गँवारी न होगी।

कभी तेरी यारी, कभी तेरी गाली,
कभी तुझसे अनबन, भी होती रही है ,
कभी तुझसे होके जुदा, मेरी गीतें,
बहुत बेसुरे धुन, सुनाती रही है,

हमारी ख़ुशी के लिए, बात अपनी,
कई बार तुमने, छुपायी भी होगी,
हमें दोस्तों के, बिना जिंदगानी,
गँवारी न है और, गँवारी न होगी।

अजब जानलेवा, सफ़र जिंदगी में,
कभी न समझना, सहारा नहीं है,
यारी को कर लेना, फिर याद उसदिन,
के मुकद्दर कोई खुद, बनाता नहीं है।

मेरे मीत, खामोश रहना ही अच्छा,
बुरा है जमाना, नज़र भी लगेगी,
हमें दोस्तों के, बिना जिंदगानी,
गँवारी न है और, गँवारी न होगी।


-ऋषि चन्द्र

Tuesday, August 2, 2011

शायरी

हो गए नाराज़ वो, और न मिले हमको कभी,
बस ढूँढ़ते और घूमते, हमने गंवाई जिंदगी,
माखौल गलियों में उड़े, चुभने लगी कितनी हँसी,
फिर थामकर, दर्द-ऐ-जिगर, करने लगे हैं शायरी...

धूप में जलना ही बेशक, अब मेरी पहचान है,
शाम ढल जाये कभी, इक बार, ये अरमान है,
कहते हैं, खुद ही ढून्ढ लेती है किनारे जिंदगी,
पर जिंदगी भी बेवफा, दो पल कि तो मेहमान है...
बेखबर इस बात से, मंजिल है लुट जाना मेरी,
थामकर , दर्द-ऐ-जिगर , करने लगे हैं शायरी...

एहसान पर एहसान मुझपर, कर रहे कितने सभी,
ये क्या दिलासे हैं के, दिल को फर्क ही पड़ता नहीं,
कितने पतंगे जल गए हैं, छू के ये रौशन दिए,
अपनी कहानी भी जुदा, उनसे, जियादा है नहीं...
हम जानकार अनजान को, कर बैठे ऐसी दिल्लगी,
के थामकर, दर्द-ऐ-जिगर, करने लगे हैं शायरी...

-ऋषि चन्द्र

Friday, July 29, 2011

ढूंढता है

ठिकाना कोई ये सफ़र ढूँढता है,
वो हाथों से फिसले पहर ढूँढता है,
हर मंजर है रौशन ही रौशन, मगर,
ये अँधेरा उजालों में घर ढूँढता है।

वो यारों की बैठक, वो कुछ प्याली चाय,
वो पागल सा हँसने का मन ढूँढता है,
बहन बांधे राखी, मिले गोद माँ की,
खुदाई का इतना महर ढूँढता है।

वो छुपना-छुपाना, वो तितली उड़ाना,
वो साइकिल चलाने के दिन ढूँढता है,
वो बारिश का पानी, हवाओं कि हलचल,
वो कश्ती बनाने के पल ढूँढता है।

ज़िन्दगी, तुझसे कोई शिकायत नहीं है,
मगर दिल ये थोड़ा, अदब ढूँढता है,
अजब है कहानी, तेरी भी मेरी भी,
मैं तुझमे, तु मुझमे, कसर ढूँढता है।

- ऋषि चन्द्र

Sunday, July 24, 2011

जिन्दादिली

दर से तुम्हारे जो रुख्सत न होते,
तो मिलने के तुमसे ये मकसद न होते,
नया फिर सवेरा भला कैसे होता,
ठहरते अगर ये अँधेरे न होते।

पता रास्तों का न होता हमें जो
कभी राह पर यूँ अकेले न चलते,
मोहब्बत न होती, वफ़ा न निभाते,
कभी दर्दे - दिल जो उठाये न होते।

यूँ ही दूर तक जिंदगी के सफ़र में,
कई हैं मिले तो कई छूट जाते,
न दिल पे वो ऐसी मुहर ठोक जाते,
न यूँ बेकदर वो हमें याद आते।

हँसी होंठ पे, आँख में कुछ नमी है,
वो ग़म पी गए इसलिए ये ख़ुशी है,
सहारा जो सपनो का होता न हमको,
न जिन्दादिली का मजा ढूँढ पाते।

- ऋषि चन्द्र

Thursday, April 28, 2011

ढूँढ़ते रह जायेंगे

दूरियों से डर नहीं था कल तलक,
पर आज आँखों में न जाने क्यूँ नमी है,
भाव क्यूँ बदले हुए चेहरे पे सबके,
वक़्त के पहिये पे धड़कन क्यूँ थमी है।

भावनाओं में कभी बहते न थे,
और थम जाने की थी आदत नहीं,
ये आज हमपर कौन काबिज हो गया,
जो पार इक दहलीज भी होती नहीं।

कल यहाँ जब भी कभी हम आयेंगे,
पहचान हो अनजान सारे जायेंगे,
कुछ नए चेहरों में खुशियाँ जो मिलेगी,
बस वही अपनी झलक दिखलायेंगे।

कोई हमारे साथ हो या ना सही,
यादों के साए साथ ही रह जायेंगे,
जब भी पलट कर फिर पढेंगे जिंदगी,
जो खो गया है, ढूँढ़ते रह जायेंगे।

Monday, January 31, 2011

जब यूँ लगने लगे
संहार पर संहार कर, इतिहास जब बढ़ने लगे,
युद्ध की चर्चा हो सब में, शांति पर हसने लगें,
यज्ञ-हवनों से भला, क्या पुण्य पायेगा कोई,
सत्य को जब झूठ कहना, लाजमी लगने लगे।
साथ देना शक्ति का, हरदम सुहाने जब लगे,
और निर्बल की लहू का, रंग पानी सा लगे,
हैवान के पंजों से बचने, का भला है प्रश्न क्या,
इमान जब इन्सान का ही, इस कदर मरने लगे।
कुछ शिशु नन्हे से, खेतों में पड़े पलने लगें,
और कुछ पलनों में ही, जीवन बसर करने लगें,
तब भला क्या दोष देना, है विधाता को बता,
जब के मानव मूल्य की ही, धज्जियाँ उड़ने लगे,
थरथराते डर से, घर में, गृहणियां छुपने लगें,
व्यंग के फरसों से आहत, युवतियाँ होने लगें,
तब भला नीलाम क्यूँ, पर्दा नहीं होता फिरे,
बाज़ार में जब शर्म, सस्ते भाव का बिकने लगे।
आदमी सड़कों पे, मारे ठण्ड के, मरने लगे,
और ऐ.सी कार में, कुत्ते सफ़र करने लगे,
प्रेम पशुवों से तो करना, सीखते हैं जा रहे,
पर,हमारे कौम को, हम ही तबाह करने लगे।
तपिश, जब निर्धन के चूल्हों में, सदा मिलने लगे,
और, बेघर घर बसाकर,चैन से रहने लगें,
बेअदब दुनिया में मुमकिन,काश! ऐसा हो सके,
हर गली,हर द्वार,इक परिवार सा लगने लगे।

Friday, January 28, 2011

मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥

या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख, नंद की धेनु चराय बिसारौं॥
रसखान कबौं इन आँखिन सों, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक हू कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥

सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै।
जाहि अनादि अनंत अखण्ड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥
नारद से सुक व्यास रहे, पचिहारे तू पुनि पार न पावैं।
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥

धुरि भरे अति सोहत स्याम जू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनी बाजति, पीरी कछोटी॥
वा छबि को रसखान बिलोकत, वारत काम कला निधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों लै गयो माखन रोटी॥

कानन दै अँगुरी रहिहौं, जबही मुरली धुनि मंद बजैहै।
माहिनि तानन सों रसखान, अटा चड़ि गोधन गैहै पै गैहै॥
टेरी कहाँ सिगरे ब्रजलोगनि, काल्हि कोई कितनो समझैहै।
माई री वा मुख की मुसकान, सम्हारि न जैहै, न जैहै, न जैहै॥

मोरपखा मुरली बनमाल, लख्यौ हिय मै हियरा उमह्यो री।
ता दिन तें इन बैरिन कों, कहि कौन न बोलकुबोल सह्यो री॥
अब तौ रसखान सनेह लग्यौ, कौउ एक कह्यो कोउ लाख कह्यो री।
और सो रंग रह्यो न रह्यो, इक रंग रंगीले सो रंग रह्यो री।

- रसखान