Wednesday, January 11, 2012

मिट्टी

मैं मिट्टी के छोटे छोटे
दो गोले गाँव से लाया हूँ
जब जब व्याकुल मन रोया है
मैं उसे चूमता आया हूँ

रात मिले दिन भी आए
इस राह पे यूँ चलते चलते
बरसों बीते देख सका मैं
सूरज को उगते ढलते
ना चला रास्ते चुन चुन कर
ना लिपट किसी से पाया हूँ
ना झूमा पेड़ की टहनी से
ना तोड़ कोई फल खाया हूँ
मैं मिट्टी के छोटे छोटे
दो गोले गाँव से लाया हूँ
जब जब व्याकुल मन रोया है
मैं उसे चूमता आया हूँ


उस पीली धुप में पीपल के
वो छांव भूले जाते हैं
उस नदिया में मछुवारों के
वो नाव भूले जाते हैं
ना नंगे पाँव चला फिर से
ना मैला मैं हो पाया हूँ
ना रूठ के घर से भागा फिर
ना भूखा ही रह पाया हूँ
मैं मिट्टी के छोटे छोटे
दो गोले गाँव से लाया हूँ
जब जब व्याकुल मन रोया है
मैं उसे चूमता आया हूँ......


- ऋषि चन्द्र