Tuesday, November 26, 2013

शोर में कुछ सुनाई नहीं देता,
भीड़ में कुछ दिखाई नहीं देता,
तनहाई और गहराती जाती है देखिये,
मुझे जीते जाने पे कोई बधाई नहीं देता ..  

Saturday, July 6, 2013

ढूँढ लेंगे
एक दिन…

एक दिन…. 
वीरानियों में …. 
तनहाइयों  में ….
एक हम होंगे वहां जब बेसहारे….
हम क्षुधा के नाम के सारे निवाले
ढूँढ लेंगे ...


एक दिन...
चलते सफ़र में...
बूढ़े नज़र में...
याद जब आएँगे  वो किस्से पुराने...
नम  निगाहों को हँसाने के बहाने 
ढूँढ लेंगे ...


एक दिन...
थक कर गिरेंगे...
तिल तिल मरेंगे....
जब बहते हुए नैय्या लगेगी उस किनारे...
हम यामिनी में दीप की उस रौशनी को
ढूँढ लेंगे...

Sunday, May 12, 2013

माँ  
 
माटी चबाता, भागता मैं घर-द्वारे,
और छरी ले कर मुझे माँ ढूँढती थी । 
 डांट खा कर आँसुओं के धार बहते,
गोद में ले कर मुझे फिर चूमती थी ॥  

हालत बिगड़ जाती किताबें देख कर जब,
आँखें बड़ी कर के मुझे वो देखती थी। 
हुल्लड़ मचा कर उस के आँचल में ही छिपता,
सारी शिकायत माँ बिचारी झेलती थी ॥

हर स्वाद फीका आज है, भूखा बहुत हूँ ,
ऐसी क्षुधा मुझको नहीं तब घेरती थी , 
प्यार से मुझ को खिला कर दूध-रोटी,
हाथ मेरे सिर पे जब तू फेरती थी ॥ 

-ऋषि चन्द्र 

Thursday, May 9, 2013



तुम  राज़  हो  कोई

मधुमय  सुराही  सी  ढली  आवाज़  हो  कोई
या  कोहिनूरी  सी  चमकती  नाज़  हो  कोई
तुम  हो  अजंता  की  कला  या  ताज  तुम  ही  हो
गुमराह  हू मैं, अनकही  तुम राज़  हो  कोई...

तुम  राज़  हो  कोई ...तुम  राज़  हो  कोई ...


पूर्णमासी  की  विभा  सी  तुम  बरसती  हो
या  चौदवी  के  रात  की  हो  चन्द्रमा  कोई
बारिश  के  रिमझिम  से  उठी  माटी की  वो  खुशबू
या  कन्हैया  की  सुरीली  बांसुरी  कोई
तुम  सुबह  की  वंदना  में  गा  रही  वीना
या  सांझ  के  दीपक  की  टिमटिम  रौशनी  कोई
अटखेलियाँ  करती  हुई  बहती  बसंती  हो
या  आठवें  सुर  में  सजी  तुम  साज़  हो  कोई ...

तुम  राज़  हो  कोई ...तुम  राज़  हो  कोई ...


तुम  कली  हो  ओस  की  बूंदों  के  चादर  में
या  के  सुन्दरता  की  परिभाषा  तुम्ही  तुम  हो
गंगा  हो  तुम  यमुना  हो  या  संगम  हो  तुम  कोई
या  के  देवों  की  कठिनतम  साधना  कोई
तुम  कवी  के  कल्पना  विस्तार  का  झरना
या  के  हर  श्रिंगार  का  तुम  ही  समागम  हो
गुर  से  भी  मीठी  हो  जो  इमली  से  भी  हो  खट्टी
चंचल  नयी  दुल्हन  का  ऐसा  लाज  हो  कोई...

तुम  राज़  हो  कोई ...तुम  राज़  हो  कोई ...

गागर  भरे  पनघट  पे  हँसती  राधिका  रानी
या  राम  के  रघुकुल  की  मर्यादा  हो  तुम  कोई
माँ  की  ममतामय  सजल  आँखों  की  धारा हो
हो  मेरी  श्रद्धा  तुम्ही  तुलसी  हो  आँगन  की
तुम  धरा  नभ  वायु  जल  भी  और  ज्वाला  भी
या  सकल ब्रह्माण्ड  की  तुम  स्वामिनी  कोई
गजगामिनी  मनोहारिणी  तेजस्विनी  माया !
तुम मेरे  मर्ज़--मौत  का  इलाज़  हो   कोई...
गुमराह  हू मैं, अनकही  तुम राज़  हो  कोई...

तुम  राज़  हो  कोई ...तुम  राज़  हो  कोई ...