थोड़ा होश है
इस वक़्त थोडा सा नशा है और थोडा होश है
पहली दफा तनहाइयों में लब नहीं खामोश है...
इसलिए गहरा गया शायद अँधेरा रात का
के अब उसे गुमनाम रहने का नहीं अफ़सोस है
टूट कर तारा गिरा है इसलिए शायद अभी
के थकता रहा वो भी सफ़र पे आसमां में रोज़ है
चुप रहे तो खोलने को राज़ सब कहने लगे
बोल बैठे तो कहा छोडो अभी मदहोश है
चुप रहे तो खोलने को राज़ सब कहने लगे
बोल बैठे तो कहा छोडो अभी मदहोश है
इस वक़्त थोडा सा नशा है और थोडा होश है
पहली दफा तनहाइयों में लब नहीं खामोश है...
खूबसूरत है सुना है वादियों की वो सुबह
ले चल मुझे भी उस जहां का रास्ता जिस ओर है
कितने जमाने हो गए हैं इन गुफाओं में हमें,
क्या पता कितनी बची हाथों में अब ये डोर है,
जो रास्ते हमने चुने उनकी कहानी और थी
न ही किसी से कुछ गिला ना ही हमारा दोष है
जो रास्ते हमने चुने उनकी कहानी और थी
न ही किसी से कुछ गिला ना ही हमारा दोष है
इस वक़्त थोडा सा नशा है और थोडा होश है
पहली दफा तनहाइयों में लब नहीं खामोश है...
-ऋषि चन्द्र