Thursday, September 2, 2010

काफिर भले कहलाइए

दिल्लगी की इंतहां हमको नहीं सिखलाइए,
मुहब्बत के मायने न समझिये न समझाइए,
ये खेल खेलें इश्क का जो लोग जानेंगे वही,
के इश्क में बस डूबिये और डूबते ही जाइये|
न आरज़ू की बंदिशें कोई ठिकाना दे सके,
न टीस सिने की कोई दूजा बहाना दे सके,
जिनको खुदा हैं मानते जालिम नहीं बतलाइए,
रंगीन उनका जश्न हो, काफिर भले कहलाइए|
-ऋषि चन्द्र

Wednesday, August 11, 2010

कारवां गुज़र गया

कारवाँ गुज़र गया

स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़ेखड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पातपात झर गये कि शाख़शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क बन गए,
छंद हो दफन गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँधुआँ पहन गये,
और हम झुकेझुके,
मोड़ पर रुकेरुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूलफूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना सिहर उठा,
इस तरफ ज़मीन उठी तो आसमान उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कलीकली कि घुट गयी गलीगली,
और हम लुटेलुटे,
वक्त से पिटेपिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखरबिखर,
और हम डरेडरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरनचरन,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयननयन,
पर तभी ज़हर भरी,
गाज एक वह गिरी,
पुँछ गया सिंदूर तारतार हुई चूनरी,
और हम अजानसे,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

- गोपालदास नीरज

Saturday, August 7, 2010

ज़ात पियक्कड़ वाली है

तुम दिन की क्या बतलाते हो ?
हर रोज़ यहाँ दीवाली है,
मैं दुनिया को उल्टा देखूं,
मेरी ज़ात पियक्कड़ वाली है|

मुझसे बाज़ी खेल सनम,
तेरे बादशाह का मोल नहीं,
मुझे अँधा समझे कोई,
मदहोश हु मैं, बेहोश नहीं|
गोरा भी नहीं काला भी नहीं,
मेरी रंगत खालिस लाली है,
मेरा भेद मिट गया दुनिया से,
मेरी ज़ात पियक्कड़ वाली है||

तुम सभ्य पुरुष कहलाते हो,
क्या तुम में कोई दोष नहीं?
तुम्हें अपनों की बर्बादी का,
होता कोई अफ़सोस नहीं?
हाँ, रात तो काली होती है,
पर दिन क्यूँ इतनी काली है?
मेरी नज़रें देख रहीं दुनिया,
मेरी ज़ात पियक्कड़ वाली है||

हर रात अकेले जगता हूँ,
हर सुबह अँधेरा ढंकता हूँ,
कभी सन्नाटा मुझको खाता,
कभी मैं उसको खा जाता हूँ|
धू-धू कर के, एक वृक्ष जला,
ना बाग़ ना कोई माली है,
मेरी नस-नस नशे की है बस्ती,
मेरी ज़ात पियक्कड़ वाली है||
-ऋषि चन्द्र