काफिर भले कहलाइए
दिल्लगी की इंतहां हमको नहीं सिखलाइए,
मुहब्बत के मायने न समझिये न समझाइए,
ये खेल खेलें इश्क का जो लोग जानेंगे वही,
के इश्क में बस डूबिये और डूबते ही जाइये|
न आरज़ू की बंदिशें कोई ठिकाना दे सके,
न टीस सिने की कोई दूजा बहाना दे सके,
जिनको खुदा हैं मानते जालिम नहीं बतलाइए,
रंगीन उनका जश्न हो, काफिर भले कहलाइए|
-ऋषि चन्द्र
बहुत सुन्दर रचना…………
ReplyDeletedhanyawad
ReplyDeleteजय श्री कृष्ण...आपका लेखन वाकई काबिल-ए-तारीफ हैं....नव वर्ष आपके व आपके परिवार जनों, शुभ चिंतकों तथा मित्रों के जीवन को प्रगति पथ पर सफलता का सौपान करायें .....मेरी कविताओ पर टिप्पणी के लिए आपका आभार ...आगे भी इसी प्रकार प्रोत्साहित करते रहिएगा ..!!
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