फासलों की ओर चलते हैं कदम रो कर
बिगड़ी बनाने की कसम भी रोज़ खाते हैं
फिर अचानक धमनियों में खून जमता है
और बेतहाशा, लड़खड़ाते, लौट आते हैं ...
Wednesday, April 11, 2012
Friday, April 6, 2012
चलता जा
पग-पग दो पग हैं साथ तेरे,
क्षण-क्षण हर क्षण अभिलाषी है,
चलता जा मन तू क्या जाने,
क्या क्या तय होना बाँकी है...
क्या हुआ जो सपना उजड़ गया,
क्या हुआ जो साथी बिछड़ गया,
बहते जाने को धारे पर,
बस एक ही तिनका काफी है...
सूरज में इतनी तपिश नहीं,
आंधी में ऐसा वेग नहीं,
अवरुद्ध कर सके राह तेरी,
इच्छा जबतक निश्पापी है...
पग-पग दो पग हैं साथ तेरे,
क्षण-क्षण हर क्षण अभिलाषी है,
चलता जा मन तू क्या जाने,
क्या क्या तय होना बाँकी है...
परवाह न कर उस मंजिल की
जो पहुँच कहीं रुक जाती है,
वो है अनंत तक राह तेरी,
तू केवल उसका राही है...
झंकार नसों में बज उट्ठे,
जग निश्चय देख सिहर उट्ठे,
जब बुझता है तारा-तारा,
तब भोर स्वतः हो जाती है,
पग-पग दो पग हैं साथ तेरे,
क्षण-क्षण हर क्षण अभिलाषी है,
चलता जा मन तू क्या जाने,
क्या क्या तय होना बाँकी है...
-ऋषि चन्द्र
पग-पग दो पग हैं साथ तेरे,
क्षण-क्षण हर क्षण अभिलाषी है,
चलता जा मन तू क्या जाने,
क्या क्या तय होना बाँकी है...
क्या हुआ जो सपना उजड़ गया,
क्या हुआ जो साथी बिछड़ गया,
बहते जाने को धारे पर,
बस एक ही तिनका काफी है...
सूरज में इतनी तपिश नहीं,
आंधी में ऐसा वेग नहीं,
अवरुद्ध कर सके राह तेरी,
इच्छा जबतक निश्पापी है...
पग-पग दो पग हैं साथ तेरे,
क्षण-क्षण हर क्षण अभिलाषी है,
चलता जा मन तू क्या जाने,
क्या क्या तय होना बाँकी है...
परवाह न कर उस मंजिल की
जो पहुँच कहीं रुक जाती है,
वो है अनंत तक राह तेरी,
तू केवल उसका राही है...
झंकार नसों में बज उट्ठे,
जग निश्चय देख सिहर उट्ठे,
जब बुझता है तारा-तारा,
तब भोर स्वतः हो जाती है,
पग-पग दो पग हैं साथ तेरे,
क्षण-क्षण हर क्षण अभिलाषी है,
चलता जा मन तू क्या जाने,
क्या क्या तय होना बाँकी है...
-ऋषि चन्द्र
Sunday, April 1, 2012
ऐसा भी लगता है कभी
ऐसा भी लगता है कभी, बेचैन जब होता हूँ मैं,
जैसे के कुछ खाली सा है, जैसे के कुछ हारा हूँ मैं...
ये चोट शायद इस दफा, गहरी सी है,
अंजान सी इक टीस है, चुभती भी है,
कुछ घुट गया अन्दर ही अन्दर तो भले,
पर मूक मन सब चीखकर कहती भी है...
भ्रम तो नहीं कुछ भी, मगर, रह रह के खो जाता हूँ मैं,
ठहराव है हर ओर, पर, मन से ही बंजारा हूँ मैं...
ऐसा भी लगता है कभी, बेचैन जब होता हूँ मैं,
जैसे के कुछ खाली सा है, जैसे के कुछ हारा हूँ मैं...
-ऋषि चन्द्र
ऐसा भी लगता है कभी, बेचैन जब होता हूँ मैं,
जैसे के कुछ खाली सा है, जैसे के कुछ हारा हूँ मैं...
ये चोट शायद इस दफा, गहरी सी है,
अंजान सी इक टीस है, चुभती भी है,
कुछ घुट गया अन्दर ही अन्दर तो भले,
पर मूक मन सब चीखकर कहती भी है...
भ्रम तो नहीं कुछ भी, मगर, रह रह के खो जाता हूँ मैं,
ठहराव है हर ओर, पर, मन से ही बंजारा हूँ मैं...
ऐसा भी लगता है कभी, बेचैन जब होता हूँ मैं,
जैसे के कुछ खाली सा है, जैसे के कुछ हारा हूँ मैं...
-ऋषि चन्द्र
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