आस में
खिलखिलाते दौड़ते तितली के पीछे बाग़ में
हमने पतंगों के लिए मंझे बनाये धाग में
माटी उड़ी, पत्थर चले, दो फल गिरे, ले कर चले
धूल में कंकर मिला दी और पानी आग में ...
गन्ने चुराए खेत से माली भी चिल्लाता रहा
उसको दिखा के मैं अंगूठा दूर से हँसता रहा
बिल्ली को उसदिन फिर भगाया था शहर में दूर तक
फिर छांव में इक पेड़ के मैं बेखबर सोता रहा
चीटियों की पंक्तियों के साथ मैं जाता रहा
कोयल की कू-कू संग उसके राग में गाता रहा
आंटे की गोली मछलियों को डाल दी तालाब में
फिर किनारे बैठ कर मैं भी वही खाता रहा
पंछियों के साथ मैं उड़ता रहा आकाश में
रौशनी मद्धिम , नमी आने लगी थी घास में
दीपक जले सुन आरती की गूँज मैं वापिस चला
तुलसी के पत्तों के लिए होगी मेरी माँ आस में ...
-ऋषि चन्द्र
खिलखिलाते दौड़ते तितली के पीछे बाग़ में
हमने पतंगों के लिए मंझे बनाये धाग में
माटी उड़ी, पत्थर चले, दो फल गिरे, ले कर चले
धूल में कंकर मिला दी और पानी आग में ...
गन्ने चुराए खेत से माली भी चिल्लाता रहा
उसको दिखा के मैं अंगूठा दूर से हँसता रहा
बिल्ली को उसदिन फिर भगाया था शहर में दूर तक
फिर छांव में इक पेड़ के मैं बेखबर सोता रहा
चीटियों की पंक्तियों के साथ मैं जाता रहा
कोयल की कू-कू संग उसके राग में गाता रहा
आंटे की गोली मछलियों को डाल दी तालाब में
फिर किनारे बैठ कर मैं भी वही खाता रहा
पंछियों के साथ मैं उड़ता रहा आकाश में
रौशनी मद्धिम , नमी आने लगी थी घास में
दीपक जले सुन आरती की गूँज मैं वापिस चला
तुलसी के पत्तों के लिए होगी मेरी माँ आस में ...
-ऋषि चन्द्र