Friday, November 25, 2011

आस में

खिलखिलाते
दौड़ते तितली के पीछे बाग़ में
हमने पतंगों के लिए मंझे बनाये धाग में
माटी उड़ी, पत्थर चले, दो फल गिरे, ले कर चले
धूल में कंकर मिला दी और पानी आग में ...


गन्ने चुराए खेत से माली भी चिल्लाता रहा
उसको दिखा के मैं अंगूठा दूर से हँसता रहा
बिल्ली को उसदिन फिर भगाया था शहर में दूर तक
फिर छांव में इक पेड़ के मैं बेखबर सोता रहा


चीटियों की पंक्तियों के साथ मैं जाता रहा
कोयल की कू-कू संग उसके राग में गाता रहा
आंटे की गोली मछलियों को डाल दी तालाब में
फिर किनारे बैठ कर मैं भी वही खाता रहा


पंछियों के साथ मैं उड़ता रहा आकाश में
रौशनी मद्धिम , नमी आने लगी थी घास में
दीपक जले सुन आरती की गूँज मैं वापिस चला
तुलसी के पत्तों के लिए होगी मेरी माँ आस में ...


-ऋषि चन्द्र

Wednesday, November 2, 2011

अमर-प्राण

अग्निवर्षा में भीग-भीग
कतरा-कतरा बह जायेगा
रोम -रोम तक झुलस -झुलस कर
रक्तहीन हो जायेगा
अंतहीन सागर का जैसे
लहर-लहर लड़ जाएगा
छीन-छीन कर यम से ही
मृत्यु अपनी हर लायेगा
निखर-निखर उठ्ठेगी भूमी
नहा-नहा शव आएगा
दूर-दूर तक शत्रु का भ्रम
चूर-चूर हो जायेगा
अंधेर नगर अंगारों से ही
दीप्तमान हो जाएगा
शंखनाद से दिशा-दिशा
गुंजायमान हो जायेगा
बीतेगा ऐसे प्रहर-प्रहर
जो कीर्तिमान बन जाएगा
महावीर
मरते-मरते जब
अमर -प्राण बन जाएगा....


- ऋषि चन्द्र