Wednesday, November 2, 2011

अमर-प्राण

अग्निवर्षा में भीग-भीग
कतरा-कतरा बह जायेगा
रोम -रोम तक झुलस -झुलस कर
रक्तहीन हो जायेगा
अंतहीन सागर का जैसे
लहर-लहर लड़ जाएगा
छीन-छीन कर यम से ही
मृत्यु अपनी हर लायेगा
निखर-निखर उठ्ठेगी भूमी
नहा-नहा शव आएगा
दूर-दूर तक शत्रु का भ्रम
चूर-चूर हो जायेगा
अंधेर नगर अंगारों से ही
दीप्तमान हो जाएगा
शंखनाद से दिशा-दिशा
गुंजायमान हो जायेगा
बीतेगा ऐसे प्रहर-प्रहर
जो कीर्तिमान बन जाएगा
महावीर
मरते-मरते जब
अमर -प्राण बन जाएगा....


- ऋषि चन्द्र

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