Friday, July 29, 2011

ढूंढता है

ठिकाना कोई ये सफ़र ढूँढता है,
वो हाथों से फिसले पहर ढूँढता है,
हर मंजर है रौशन ही रौशन, मगर,
ये अँधेरा उजालों में घर ढूँढता है।

वो यारों की बैठक, वो कुछ प्याली चाय,
वो पागल सा हँसने का मन ढूँढता है,
बहन बांधे राखी, मिले गोद माँ की,
खुदाई का इतना महर ढूँढता है।

वो छुपना-छुपाना, वो तितली उड़ाना,
वो साइकिल चलाने के दिन ढूँढता है,
वो बारिश का पानी, हवाओं कि हलचल,
वो कश्ती बनाने के पल ढूँढता है।

ज़िन्दगी, तुझसे कोई शिकायत नहीं है,
मगर दिल ये थोड़ा, अदब ढूँढता है,
अजब है कहानी, तेरी भी मेरी भी,
मैं तुझमे, तु मुझमे, कसर ढूँढता है।

- ऋषि चन्द्र

Sunday, July 24, 2011

जिन्दादिली

दर से तुम्हारे जो रुख्सत न होते,
तो मिलने के तुमसे ये मकसद न होते,
नया फिर सवेरा भला कैसे होता,
ठहरते अगर ये अँधेरे न होते।

पता रास्तों का न होता हमें जो
कभी राह पर यूँ अकेले न चलते,
मोहब्बत न होती, वफ़ा न निभाते,
कभी दर्दे - दिल जो उठाये न होते।

यूँ ही दूर तक जिंदगी के सफ़र में,
कई हैं मिले तो कई छूट जाते,
न दिल पे वो ऐसी मुहर ठोक जाते,
न यूँ बेकदर वो हमें याद आते।

हँसी होंठ पे, आँख में कुछ नमी है,
वो ग़म पी गए इसलिए ये ख़ुशी है,
सहारा जो सपनो का होता न हमको,
न जिन्दादिली का मजा ढूँढ पाते।

- ऋषि चन्द्र