Friday, May 17, 2019

मौत की परवाह 

भय के काजल को सजा आँखों में,
आँखें स्याह कर ली,
चार दीवारी में पर्वत के शिखर की 
चाह कर ली,
ले कर समंदर दिल में अपने,
बूँद को तरसा किए,
और ज़िन्दगी भर क्या किया,
बस मौत की परवाह कर ली।  

जब गया मौसम बदल,
हर बार आंधी साथ आई,
तब यूँ किया, मंदिर गए,
माला जपा, घंटी बजाई,
जो डट गए राहों में,
फिर चाहे भला, जैसी बला हो,
बस देखते उनको रहे,
जो किस्मत की देते थे दुहाई।

भीड़ थी जाती जिधर,
उस ही तरफ की राह कर ली,
और ज़िन्दगी भर क्या किया,
बस मौत की परवाह कर ली। 

- ऋषि चंद्र 

Saturday, May 4, 2019

ज़िन्दगी

उठने दे दिल में  आज, अरमानों की लहरों को,
तुझ से ही सब है, बिन तेरे ये सब बेमानी है,
कुछ भी नहीं है वक़्त, स्याही है इरादों की,
और ज़िन्दगी इन चंद खुशियों की कहानी है...

- ऋषि चंद्र