Monday, January 31, 2011

जब यूँ लगने लगे
संहार पर संहार कर, इतिहास जब बढ़ने लगे,
युद्ध की चर्चा हो सब में, शांति पर हसने लगें,
यज्ञ-हवनों से भला, क्या पुण्य पायेगा कोई,
सत्य को जब झूठ कहना, लाजमी लगने लगे।
साथ देना शक्ति का, हरदम सुहाने जब लगे,
और निर्बल की लहू का, रंग पानी सा लगे,
हैवान के पंजों से बचने, का भला है प्रश्न क्या,
इमान जब इन्सान का ही, इस कदर मरने लगे।
कुछ शिशु नन्हे से, खेतों में पड़े पलने लगें,
और कुछ पलनों में ही, जीवन बसर करने लगें,
तब भला क्या दोष देना, है विधाता को बता,
जब के मानव मूल्य की ही, धज्जियाँ उड़ने लगे,
थरथराते डर से, घर में, गृहणियां छुपने लगें,
व्यंग के फरसों से आहत, युवतियाँ होने लगें,
तब भला नीलाम क्यूँ, पर्दा नहीं होता फिरे,
बाज़ार में जब शर्म, सस्ते भाव का बिकने लगे।
आदमी सड़कों पे, मारे ठण्ड के, मरने लगे,
और ऐ.सी कार में, कुत्ते सफ़र करने लगे,
प्रेम पशुवों से तो करना, सीखते हैं जा रहे,
पर,हमारे कौम को, हम ही तबाह करने लगे।
तपिश, जब निर्धन के चूल्हों में, सदा मिलने लगे,
और, बेघर घर बसाकर,चैन से रहने लगें,
बेअदब दुनिया में मुमकिन,काश! ऐसा हो सके,
हर गली,हर द्वार,इक परिवार सा लगने लगे।

Friday, January 28, 2011

मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥

या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख, नंद की धेनु चराय बिसारौं॥
रसखान कबौं इन आँखिन सों, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक हू कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥

सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै।
जाहि अनादि अनंत अखण्ड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥
नारद से सुक व्यास रहे, पचिहारे तू पुनि पार न पावैं।
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥

धुरि भरे अति सोहत स्याम जू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनी बाजति, पीरी कछोटी॥
वा छबि को रसखान बिलोकत, वारत काम कला निधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों लै गयो माखन रोटी॥

कानन दै अँगुरी रहिहौं, जबही मुरली धुनि मंद बजैहै।
माहिनि तानन सों रसखान, अटा चड़ि गोधन गैहै पै गैहै॥
टेरी कहाँ सिगरे ब्रजलोगनि, काल्हि कोई कितनो समझैहै।
माई री वा मुख की मुसकान, सम्हारि न जैहै, न जैहै, न जैहै॥

मोरपखा मुरली बनमाल, लख्यौ हिय मै हियरा उमह्यो री।
ता दिन तें इन बैरिन कों, कहि कौन न बोलकुबोल सह्यो री॥
अब तौ रसखान सनेह लग्यौ, कौउ एक कह्यो कोउ लाख कह्यो री।
और सो रंग रह्यो न रह्यो, इक रंग रंगीले सो रंग रह्यो री।

- रसखान