जब यूँ लगने लगे
संहार पर संहार कर, इतिहास जब बढ़ने लगे,
युद्ध की चर्चा हो सब में, शांति पर हसने लगें,
यज्ञ-हवनों से भला, क्या पुण्य पायेगा कोई,
सत्य को जब झूठ कहना, लाजमी लगने लगे।
साथ देना शक्ति का, हरदम सुहाने जब लगे,
और निर्बल की लहू का, रंग पानी सा लगे,
हैवान के पंजों से बचने, का भला है प्रश्न क्या,
इमान जब इन्सान का ही, इस कदर मरने लगे।
कुछ शिशु नन्हे से, खेतों में पड़े पलने लगें,
और कुछ पलनों में ही, जीवन बसर करने लगें,
तब भला क्या दोष देना, है विधाता को बता,
जब के मानव मूल्य की ही, धज्जियाँ उड़ने लगे,
थरथराते डर से, घर में, गृहणियां छुपने लगें,
व्यंग के फरसों से आहत, युवतियाँ होने लगें,
तब भला नीलाम क्यूँ, पर्दा नहीं होता फिरे,
बाज़ार में जब शर्म, सस्ते भाव का बिकने लगे।
आदमी सड़कों पे, मारे ठण्ड के, मरने लगे,
और ऐ.सी कार में, कुत्ते सफ़र करने लगे,
प्रेम पशुवों से तो करना, सीखते हैं जा रहे,
पर,हमारे कौम को, हम ही तबाह करने लगे।
तपिश, जब निर्धन के चूल्हों में, सदा मिलने लगे,
और, बेघर घर बसाकर,चैन से रहने लगें,
बेअदब दुनिया में मुमकिन,काश! ऐसा हो सके,
हर गली,हर द्वार,इक परिवार सा लगने लगे।
No comments:
New comments are not allowed.