Wednesday, August 31, 2011



डगमगाते होंगे शायद ये कदम,


पर नाचने उस जस्न में हम आयेंगे,


जब कुछ घरी होगी ज़नाज़े को मेरे,


कंधे पे हम डोली तेरी ले जायेंगे...




Monday, August 29, 2011

क्या कम हुआ?

दुश्मन बना बैठे, दीवाने को अगर, तो क्या हुआ
रिश्ता कोई कायम हुआ, इतना करम, क्या कम हुआ?

अपना पता, उनकी खबर में, भूलने लगते हैं हम,
उनकी झलक पे, साँस अपनी, रोकने लगते हैं हम,
जो फेरते हैं देख कर, हमसे नज़र, तो क्या हुआ,
इक बार का दीदार भी, नाचीज़ को, क्या कम हुआ?

आजकल चर्चों को, मेरे आबरू की भूख है,
सुना है के उन लतीफों में, मसाला खूब है,
लाखों ठहाकों ने, किया हमपर कहर, तो क्या हुआ,
उनकी हँसी का भी, मिला तोहफा हमें, क्या कम हुआ?

हासिल नहीं वो हो सके, हासिल हमें जिसने किया,
मुमकिन नहीं के छूट जाये,जो नशा हमने किया,
आँचल में उनके, ग़म कभी, भूले नहीं तो क्या हुआ,
शोहरत कफ़न पाएगी, उनके नाम से, क्या कम हुआ?

दुश्मन बना बैठे, दीवाने को कोई, तो क्या हुआ
रिश्ता कोई कायम हुआ, इतना करम, क्या कम हुआ?

-ऋषि चन्द्र

Tuesday, August 23, 2011

काश!

फिर से तलाश करता मंजिल,
फिर से राहें ढूँढा करता,
इक रोज़ कहीं चलते चलते,
काश! अगर मैं खो जाता...

काश! के मेरे हाथों से,
कुछ बनी लकीरें मिट जाती,
काश! के मेरे माथे की,
ये शिकन कहीं जा छिप जाती,
जो दफन हो गया है मुझमे,
वो राज़ उजागर हो जाता,
इक रोज़ कहीं चलते चलते,
काश अगर मैं खो जाता...


काश! वक़्त फिर से चुनाव का,
अवसर मुझको दे देता,
काश! वो सपने आँखों में,
मैं छीन के फिर से ले आता,
आज़ाद समंदर के रस्ते,
तालाब का पानी चल पड़ता,
इक रोज़ कहीं चलते चलते,
काश अगर मैं खो जाता...

फिर से तलाश करता मंजिल,
फिर से राहें ढूँढा करता,
इक रोज़ कहीं चलते चलते,
काश अगर मैं खो जाता...

- ऋषि चन्द्र

Saturday, August 20, 2011

देखें कब तक जीते हैं

इक ज़ख्म छुपा है सीने में,
और ज़हर उसी का पीते हैं,
मौत की ख्वाइश हमें नहीं,
पर,देखें कब तक जीते हैं...

मैखाने कैसे छोर दिए,
पूछो मत यूँ नादानी से,
पीते भी क्या हम बतलाओ,
जब नशा हो रहा पानी से

बेकल मन की आवाजों को,
करती धड़कन आज़ाद नहीं,
तिल तिल हरदिन लुटते लुटते,
हो जाऊं न बर्बाद कहीं

मोहताज नहीं इस वक़्त के हम,
वो बीतेंगे वो बीते हैं,
मौत की ख्वाइश हमें नहीं,
पर देखें कब तक जीते हैं

-ऋषि चन्द्र

Wednesday, August 17, 2011

भगवान भी मजबूर होता है

जब धज्जियाँ कानून की, कानून करता है,
औलाद जब माँ बाप का ही, खून करता है,
जब रात दिन से भी अधिक, मशहूर होता है,
ऐसे में फिर भगवान भी, मजबूर होता है।

प्यास बुझती है नहीं जब, रक्त पी के भी,
चीख, सन्नाटों को, हर दिन भंग करती है,
हँसते हुए जो, मौत से भी इश्क कर बैठे,
जब ऐसे वीरों की गली, बेरंग रहती है,
जब गद्दार होना बन चुका, दस्तूर होता है,
ऐसे में फिर भगवन भी, मजबूर होता है।

फायदा, जब प्यार को भी, तोलने लगता,
जब आँसुओं के मोल, धन पहचान लेते हैं,
कहते हैं हम, है आदमी से, जानवर बेहतर
और, खुद को बेहतर बाँकियों से, मान लेते हैं
मूर्खता में मूर्ख, जब मगरूर होता है,
ऐसे में फिर भगवान् भी मजबूर होता है


धर्म जब जब बस यूँही, निःशब्द रहता है,
तब तब विनाशक लेख इक, प्रारब्ध लिखता है,
परवाह जब होती नहीं, अल्ल्हड़ जवानी को,
हर डूबते से एक तिनका, छूट जाता है
जब सत्य सुनना, कान नामंजूर करता है,
ऐसे में फिर भगवान् भी मजबूर होता है.

-ऋषि चन्द्र

Monday, August 15, 2011


ये बारिश


रिमझिम फुहारें बरसने लगी हैं,
मौसम भी करवट बदलने लगी है,
फिर से बनाकर मुझे आज ज़रिया
कागज़ से श्याही लिपटने लगी है।
फूलों पे बूँदें बजाती हैं सरगम,
कलियाँ भी खिलने को आने लगी हैं,
ऐसी नशीली बरसती है बारिश,
के नदियाँ भी इनमे नहाने लगी हैं।
हवा तेज थी जो अभी थम गयी है,
किरणों की इन्द्रधनुष बन गयी है,
विहग चहचहाते हुए फिर रहे हैं,
माटी से भीनी सुगंध उठ रही है,
चलना कदम दो कदम भी कठिन है,
सिहरन बदन में समाने लगी है,
बमुश्किल,मुझे अब यकीं हो रहा है,
के लेखक पुराना, लिखावट नयी है।
चाहे अधूरी उमर या समझ हो,
मगर अब ये सावन लुभाने लगी है,
फिर से बनाकर मुझे आज ज़रिया,
कागज़ से श्याही लिपटने लगी है।।

- ऋषि चन्द्र

Wednesday, August 10, 2011

डरती जवानी है नहीं

यूँ तोड़ दें चट्टान, के छोरें निशानी तक नहीं,
ये खून पानी है नहीं, डरती जवानी है नहीं।

हाले-बदन क्या देखता है, देख जज्बे को मेरी,
नस्ल आदम का मगर, है आग नस-नस में मेरी,
बुझता सितारा है नहीं, बहता किनारा है नहीं,
कट कर गिरे कितने यहाँ, झुकता पताका है नहीं।

बातें बेमानी ये नहीं, झूठी कहानी ये नहीं,
ये खून पानी है नहीं, डरती जवानी है नहीं।

धिक्कार है! उस आग को, तूफ़ान में जो बुझ गयी,
आंधी जलाता हूँ लपट से, देख पागलपन मेरी,
मंदिर गिरे, मस्जिद गिरे, किसने किया ये, कौन हैं?
आ सामने ! अब गोद सूनी, मेरे माँ की है नहीं।

नरसिंह की दहाड़ है, ये थरथराती है नहीं,
ये खून पानी है नहीं, डरती जवानी है नहीं।

संघर्ष मेरी ज़िन्दगी है, मौत मेरी प्रीत है,
हार कर भी जीत जाना, वीरता की रीत है।
फक्र जो खुद पर रहे, मैली गरेबां हो नहीं,
तो चार कन्धों की भी हसरत, इस ज़नाज़े को नहीं।

जो तीर निकले बाण से, भेदे बिना रुकता नहीं,
ये खून पानी है नहीं, डरती जवानी है नहीं।

-ऋषि चन्द्र

Saturday, August 6, 2011

गँवारी होगी

दवा मर्ज़-ऐ-ग़म की , तेरी दोस्ती ने,
दिलो जान से कब, पिलाई न होगी,
हमें दोस्तों के,बिना जिंदगानी ,
गँवारी न है और, गँवारी न होगी।

मुझे तुमने पर देके ,उड़ना सिखाया,
कभी रोते-रोते भी हँसना सिखाया,
है चलना तेरे संग आसान कितना,हो
डगर लाख मुश्किल, खुदा ने बनाया,

हमारे लिए, हो के बेचैन, रातें,
रो-रो के तूने, बितायी भी होगी,
हमें दोस्तों के बिना जिंदगानी,
गँवारी न है और, गँवारी न होगी।

कभी तेरी यारी, कभी तेरी गाली,
कभी तुझसे अनबन, भी होती रही है ,
कभी तुझसे होके जुदा, मेरी गीतें,
बहुत बेसुरे धुन, सुनाती रही है,

हमारी ख़ुशी के लिए, बात अपनी,
कई बार तुमने, छुपायी भी होगी,
हमें दोस्तों के, बिना जिंदगानी,
गँवारी न है और, गँवारी न होगी।

अजब जानलेवा, सफ़र जिंदगी में,
कभी न समझना, सहारा नहीं है,
यारी को कर लेना, फिर याद उसदिन,
के मुकद्दर कोई खुद, बनाता नहीं है।

मेरे मीत, खामोश रहना ही अच्छा,
बुरा है जमाना, नज़र भी लगेगी,
हमें दोस्तों के, बिना जिंदगानी,
गँवारी न है और, गँवारी न होगी।


-ऋषि चन्द्र

Tuesday, August 2, 2011

शायरी

हो गए नाराज़ वो, और न मिले हमको कभी,
बस ढूँढ़ते और घूमते, हमने गंवाई जिंदगी,
माखौल गलियों में उड़े, चुभने लगी कितनी हँसी,
फिर थामकर, दर्द-ऐ-जिगर, करने लगे हैं शायरी...

धूप में जलना ही बेशक, अब मेरी पहचान है,
शाम ढल जाये कभी, इक बार, ये अरमान है,
कहते हैं, खुद ही ढून्ढ लेती है किनारे जिंदगी,
पर जिंदगी भी बेवफा, दो पल कि तो मेहमान है...
बेखबर इस बात से, मंजिल है लुट जाना मेरी,
थामकर , दर्द-ऐ-जिगर , करने लगे हैं शायरी...

एहसान पर एहसान मुझपर, कर रहे कितने सभी,
ये क्या दिलासे हैं के, दिल को फर्क ही पड़ता नहीं,
कितने पतंगे जल गए हैं, छू के ये रौशन दिए,
अपनी कहानी भी जुदा, उनसे, जियादा है नहीं...
हम जानकार अनजान को, कर बैठे ऐसी दिल्लगी,
के थामकर, दर्द-ऐ-जिगर, करने लगे हैं शायरी...

-ऋषि चन्द्र