गँवारी न होगीदवा मर्ज़-ऐ-ग़म की , तेरी दोस्ती ने,
दिलो जान से कब, पिलाई न होगी,
हमें दोस्तों के,बिना जिंदगानी ,
गँवारी न है और, गँवारी न होगी।
मुझे तुमने पर देके ,उड़ना सिखाया,
कभी रोते-रोते भी हँसना सिखाया,
है चलना तेरे संग आसान कितना,हो
डगर लाख मुश्किल, खुदा ने बनाया,
हमारे लिए, हो के बेचैन, रातें,
रो-रो के तूने, बितायी भी होगी,
हमें दोस्तों के बिना जिंदगानी,
गँवारी न है और, गँवारी न होगी।
कभी तेरी यारी, कभी तेरी गाली,
कभी तुझसे अनबन, भी होती रही है ,
कभी तुझसे होके जुदा, मेरी गीतें,
बहुत बेसुरे धुन, सुनाती रही है,
हमारी ख़ुशी के लिए, बात अपनी,
कई बार तुमने, छुपायी भी होगी,
हमें दोस्तों के, बिना जिंदगानी,
गँवारी न है और, गँवारी न होगी।
अजब जानलेवा, सफ़र जिंदगी में,
कभी न समझना, सहारा नहीं है,
यारी को कर लेना, फिर याद उसदिन,
के मुकद्दर कोई खुद, बनाता नहीं है।
मेरे मीत, खामोश रहना ही अच्छा,
बुरा है जमाना, नज़र भी लगेगी,
हमें दोस्तों के, बिना जिंदगानी,
गँवारी न है और, गँवारी न होगी।
-ऋषि चन्द्र