Wednesday, August 17, 2011

भगवान भी मजबूर होता है

जब धज्जियाँ कानून की, कानून करता है,
औलाद जब माँ बाप का ही, खून करता है,
जब रात दिन से भी अधिक, मशहूर होता है,
ऐसे में फिर भगवान भी, मजबूर होता है।

प्यास बुझती है नहीं जब, रक्त पी के भी,
चीख, सन्नाटों को, हर दिन भंग करती है,
हँसते हुए जो, मौत से भी इश्क कर बैठे,
जब ऐसे वीरों की गली, बेरंग रहती है,
जब गद्दार होना बन चुका, दस्तूर होता है,
ऐसे में फिर भगवन भी, मजबूर होता है।

फायदा, जब प्यार को भी, तोलने लगता,
जब आँसुओं के मोल, धन पहचान लेते हैं,
कहते हैं हम, है आदमी से, जानवर बेहतर
और, खुद को बेहतर बाँकियों से, मान लेते हैं
मूर्खता में मूर्ख, जब मगरूर होता है,
ऐसे में फिर भगवान् भी मजबूर होता है


धर्म जब जब बस यूँही, निःशब्द रहता है,
तब तब विनाशक लेख इक, प्रारब्ध लिखता है,
परवाह जब होती नहीं, अल्ल्हड़ जवानी को,
हर डूबते से एक तिनका, छूट जाता है
जब सत्य सुनना, कान नामंजूर करता है,
ऐसे में फिर भगवान् भी मजबूर होता है.

-ऋषि चन्द्र

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