Monday, August 15, 2011


ये बारिश


रिमझिम फुहारें बरसने लगी हैं,
मौसम भी करवट बदलने लगी है,
फिर से बनाकर मुझे आज ज़रिया
कागज़ से श्याही लिपटने लगी है।
फूलों पे बूँदें बजाती हैं सरगम,
कलियाँ भी खिलने को आने लगी हैं,
ऐसी नशीली बरसती है बारिश,
के नदियाँ भी इनमे नहाने लगी हैं।
हवा तेज थी जो अभी थम गयी है,
किरणों की इन्द्रधनुष बन गयी है,
विहग चहचहाते हुए फिर रहे हैं,
माटी से भीनी सुगंध उठ रही है,
चलना कदम दो कदम भी कठिन है,
सिहरन बदन में समाने लगी है,
बमुश्किल,मुझे अब यकीं हो रहा है,
के लेखक पुराना, लिखावट नयी है।
चाहे अधूरी उमर या समझ हो,
मगर अब ये सावन लुभाने लगी है,
फिर से बनाकर मुझे आज ज़रिया,
कागज़ से श्याही लिपटने लगी है।।

- ऋषि चन्द्र

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