Wednesday, August 10, 2011

डरती जवानी है नहीं

यूँ तोड़ दें चट्टान, के छोरें निशानी तक नहीं,
ये खून पानी है नहीं, डरती जवानी है नहीं।

हाले-बदन क्या देखता है, देख जज्बे को मेरी,
नस्ल आदम का मगर, है आग नस-नस में मेरी,
बुझता सितारा है नहीं, बहता किनारा है नहीं,
कट कर गिरे कितने यहाँ, झुकता पताका है नहीं।

बातें बेमानी ये नहीं, झूठी कहानी ये नहीं,
ये खून पानी है नहीं, डरती जवानी है नहीं।

धिक्कार है! उस आग को, तूफ़ान में जो बुझ गयी,
आंधी जलाता हूँ लपट से, देख पागलपन मेरी,
मंदिर गिरे, मस्जिद गिरे, किसने किया ये, कौन हैं?
आ सामने ! अब गोद सूनी, मेरे माँ की है नहीं।

नरसिंह की दहाड़ है, ये थरथराती है नहीं,
ये खून पानी है नहीं, डरती जवानी है नहीं।

संघर्ष मेरी ज़िन्दगी है, मौत मेरी प्रीत है,
हार कर भी जीत जाना, वीरता की रीत है।
फक्र जो खुद पर रहे, मैली गरेबां हो नहीं,
तो चार कन्धों की भी हसरत, इस ज़नाज़े को नहीं।

जो तीर निकले बाण से, भेदे बिना रुकता नहीं,
ये खून पानी है नहीं, डरती जवानी है नहीं।

-ऋषि चन्द्र

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