Saturday, August 20, 2011

देखें कब तक जीते हैं

इक ज़ख्म छुपा है सीने में,
और ज़हर उसी का पीते हैं,
मौत की ख्वाइश हमें नहीं,
पर,देखें कब तक जीते हैं...

मैखाने कैसे छोर दिए,
पूछो मत यूँ नादानी से,
पीते भी क्या हम बतलाओ,
जब नशा हो रहा पानी से

बेकल मन की आवाजों को,
करती धड़कन आज़ाद नहीं,
तिल तिल हरदिन लुटते लुटते,
हो जाऊं न बर्बाद कहीं

मोहताज नहीं इस वक़्त के हम,
वो बीतेंगे वो बीते हैं,
मौत की ख्वाइश हमें नहीं,
पर देखें कब तक जीते हैं

-ऋषि चन्द्र

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