Friday, October 21, 2011

गदहों का कुत्ता 


सुनो  सुनो  ओ  भाई !
गरम  गरम  है  मुद्दा
अभी  अभी  देखा  है  मैंने
गदहों  का  इक  कुत्ता ! 
देख  हुई  हैरानी
राज़  फास  की  ठानी...
कुछ  भी  ना  सूझा
तो  डर  डर  कर  पूछा
ओ  कुत्ते  बलवान !
है  किस  उलझन  में ?
आकर  बैठ  गया  है  कैसे
गदहों  के  घर  में ?

वो  बोला- क्या  बोल  रहा  है!
उलझन  की  क्या  बात
मैं  गदहों  का  हूँ  कुत्ता 
तो जाऊं किसके साथ ?
मैं  बोला- छोड़ो  ये  बातें
लगते  हो  चालाक
पर  गदहों  के  घर  ना  देखा
कुत्ते  देखे  लाख...


वो  बोला- ओ  हीरो !
रख  ज़मीन  पर  पैर
तुम  जैसे  ऐरे-गैरे  से 
करता भी  ना  बैर...
जो  बोझ  उठाता है  तेरा
चुपचाप  जो  सहता  हर  पीड़ा 
ऐसे  बलिदानी  को  कहते
तुम्हें  मूर्ख  लाज  ना  आती ?
तुम  रोटी  रखो  अपनी
मुझे  इज्ज़त  मेरी  प्यारी  
और  अधिक  भड़काने  की
जुर्रत  ना  करना  मुझको
देख  तेरे  नौकर  का  नौकर
काट  ना  खाए  तुझको...


दांत  देख  कर  पैने-पैने
प्राण  पखेरू  फुर्र
और  निर्दयी  दिखा-दिखा  के
करता  था  गुर-गुर्र
खीच  कंठ  में  प्राणवायु
मैंने  बोला- भगवान् !
ओ अद्भुत  ज्ञानी  महान !
क्षमा  करो  और  धन्य  करो 
दे  कर  के  ये  वरदान
इस  अबोध  के  घर  में  भी
कुत्ता  महाराज  पधारें
भोग  लगाकर  मनचाहा
अपने  उपदेश  सुनावें...


गुर्रा कर बोला-  भाँव-भाँव
भागो  सर  पे  रख  पाँव
बातें  करो  ना  टेढ़ी  मेढ़ी 
और  ना  फेंको  दाँव... 
मालिक पर  मेरे  मुझको
अब  होता  है  अभिमान
शर्म  नहीं  आती  के  मुझको
पाल  रहा  इंसान...
दिखती  है  तुझमे  ना  कोई
गदहों  वाली  बात
मैं  गदहों  का  कुत्ता 
जाऊंगा  क्यूँ   तेरे  साथ? ...


मैं  निरास  घर  आते-आते
खुद  से  पूछ  रहा  था...
क्या  हमसे  बेहतर  वो  उन
गदहों  को  बता  रहा  था ?
क्या  मेरे  ही  नाम  को  वो
गाली  सा  सुना  रहा  था ?
क्या  मेरे  वजूद  पर  वो  
प्रश्नों  को  उठा  रहा  था ?...
शायद  मेरा  भ्रम  था
या  सपना  था  कोई  भद्दा...


क्या  सच  भी  हो  सकता  है
गदहों  का  ये  कुत्ता !!....??


- ऋषि चन्द्र 

Tuesday, October 18, 2011

आँधी

मैं  कहीं  चुपचाप  सहमा  सा  खरा  था,
तभी  इक  बदलाव  की  आँधी  चली  थी,
वक़्त  के  धागे  फिसलते  जा  रहे  थे ,
और ,लहराना  बदन  की  बेबसी  थी ...

धूल  आँखों  में  लिए, सपने  दफ़न  कर ,
शामिल  हुई  इस  होड़  में  हर  ज़िन्दगी  थी,
अंजान  राहों  में  मिले  थे  लोग  ऐसे ,
के, दुश्मनों  से  ही,  हमारी  दोस्ती  थी ...
फँस  गए  ऐसे  थे  अंधर  में  परिंदे ,
के  लुट  गयी  पंखों  की  वो  आवारगी  थी ,
और  मकसद  भी  बदलते  जा  रहे  थे ,
रुख  हवा  जैसे  बदलती  जा  रही  थी ...
हाँ ,खो  गया  मेरा  बहुत  कुछ  है  मगर ,
कब , कहाँ,  मेरी  कोई  मर्ज़ी  चली  थी ,
मैं  कहीं  चुपचाप  सहमा  सा  खरा  था ,
तभी  इक  बदलाव  की  आँधी चली  थी...

Thursday, October 6, 2011

भूल  

भूल  है  तुझसे  ये  मेरी  दिल्लगी ,
के  दिल  पे  तेरे  और  कोई  नाम  है ,
फिर  भी  क़यामत  तक  चलेगा  सिलसिला ...
बाँकी  बचा  क्या  दिलजले  को  काम  है ?

इज़हार  कर  कैसे  मैं  ग़म  दे  दूँ  तुझे ,
न  इश्क  इतना  भी  बेगाना  है  मेरा ,
तुझको  खबर  ये  उम्र  भर  होगी  नहीं ,
के  और  भी  कोई  दिवाना  था  तेरा...

अक्सर  तुम्हारी  याद  आएगी  मुझे ,
अक्सर  तुम्हे  भी  आएगी  कुछ  हिचकियाँ ,
यूहीं  हँसी सजती  रहेगी  होंठ  पर  ,
चुपचाप  ही  खिंचती  रहेगी  सिसकियाँ...

लहरों  में  बहने  के  लिए  तैयार  हूँ ,
अब  डूबने  से  दिल  कहाँ अंजान  है ,
घाव  के  दुखने  में  अब  है  क्या  मज़ा ,
दर्द  जब  नासूर  का  बदनाम  है ...

भूल  है  तुझसे  ये  मेरी  दिल्लगी ,
के  दिल  पे  तेरे  और  कोई  नाम  है ,
फिर  भी  क़यामत  तक  चलेगा  सिलसिला...
बाँकी  बचा  क्या  दिलजले  को  काम  है ?


-ऋषि चन्द्र