गदहों का कुत्ता
सुनो सुनो ओ भाई !
गरम गरम है मुद्दा
अभी अभी देखा है मैंने
गदहों का इक कुत्ता !
देख हुई हैरानी
राज़ फास की ठानी...
कुछ भी ना सूझा
तो डर डर कर पूछा
ओ कुत्ते बलवान !
है किस उलझन में ?
आकर बैठ गया है कैसे
गदहों के घर में ?
वो बोला- क्या बोल रहा है!
उलझन की क्या बात
मैं गदहों का हूँ कुत्ता
तो जाऊं किसके साथ ?
मैं बोला- छोड़ो ये बातें
लगते हो चालाक
उलझन की क्या बात
मैं गदहों का हूँ कुत्ता
तो जाऊं किसके साथ ?
मैं बोला- छोड़ो ये बातें
लगते हो चालाक
पर गदहों के घर ना देखा
कुत्ते देखे लाख...वो बोला- ओ हीरो !
रख ज़मीन पर पैर
तुम जैसे ऐरे-गैरे से
करता भी ना बैर...
जो बोझ उठाता है तेरा
चुपचाप जो सहता हर पीड़ा
ऐसे बलिदानी को कहते
तुम्हें मूर्ख लाज ना आती ?
तुम रोटी रखो अपनी
मुझे इज्ज़त मेरी प्यारी
और अधिक भड़काने की
जुर्रत ना करना मुझको
देख तेरे नौकर का नौकर
काट ना खाए तुझको...
जुर्रत ना करना मुझको
देख तेरे नौकर का नौकर
काट ना खाए तुझको...
दांत देख कर पैने-पैने
प्राण पखेरू फुर्र
और निर्दयी दिखा-दिखा के
करता था गुर-गुर्र
खीच कंठ में प्राणवायु
मैंने बोला- भगवान् !
ओ अद्भुत ज्ञानी महान !
क्षमा करो और धन्य करो
दे कर के ये वरदान
इस अबोध के घर में भी
कुत्ता महाराज पधारें
भोग लगाकर मनचाहा
अपने उपदेश सुनावें...
गुर्रा कर बोला- भाँव-भाँव
भागो सर पे रख पाँव
बातें करो ना टेढ़ी मेढ़ी
और ना फेंको दाँव...
मालिक पर मेरे मुझको
अब होता है अभिमान
शर्म नहीं आती के मुझको
पाल रहा इंसान...
दिखती है तुझमे ना कोई
गदहों वाली बात
मैं गदहों का कुत्ता
जाऊंगा क्यूँ तेरे साथ? ...
दिखती है तुझमे ना कोई
गदहों वाली बात
मैं गदहों का कुत्ता
जाऊंगा क्यूँ तेरे साथ? ...
मैं निरास घर आते-आते
खुद से पूछ रहा था...
क्या हमसे बेहतर वो उन
गदहों को बता रहा था ?
क्या मेरे ही नाम को वो
गाली सा सुना रहा था ?
क्या मेरे वजूद पर वो
प्रश्नों को उठा रहा था ?...
शायद मेरा भ्रम था
या सपना था कोई भद्दा...
या सपना था कोई भद्दा...
क्या सच भी हो सकता है
गदहों का ये कुत्ता !!....??
- ऋषि चन्द्र