Thursday, October 6, 2011

भूल  

भूल  है  तुझसे  ये  मेरी  दिल्लगी ,
के  दिल  पे  तेरे  और  कोई  नाम  है ,
फिर  भी  क़यामत  तक  चलेगा  सिलसिला ...
बाँकी  बचा  क्या  दिलजले  को  काम  है ?

इज़हार  कर  कैसे  मैं  ग़म  दे  दूँ  तुझे ,
न  इश्क  इतना  भी  बेगाना  है  मेरा ,
तुझको  खबर  ये  उम्र  भर  होगी  नहीं ,
के  और  भी  कोई  दिवाना  था  तेरा...

अक्सर  तुम्हारी  याद  आएगी  मुझे ,
अक्सर  तुम्हे  भी  आएगी  कुछ  हिचकियाँ ,
यूहीं  हँसी सजती  रहेगी  होंठ  पर  ,
चुपचाप  ही  खिंचती  रहेगी  सिसकियाँ...

लहरों  में  बहने  के  लिए  तैयार  हूँ ,
अब  डूबने  से  दिल  कहाँ अंजान  है ,
घाव  के  दुखने  में  अब  है  क्या  मज़ा ,
दर्द  जब  नासूर  का  बदनाम  है ...

भूल  है  तुझसे  ये  मेरी  दिल्लगी ,
के  दिल  पे  तेरे  और  कोई  नाम  है ,
फिर  भी  क़यामत  तक  चलेगा  सिलसिला...
बाँकी  बचा  क्या  दिलजले  को  काम  है ?


-ऋषि चन्द्र 

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