Monday, November 19, 2012

 
पहले न देखी 
 
शाम...
यूँ ठहरी हुई...
पहले न देखी...

मुस्कराहट  थी
तो माथे पर शिकन भी...
आवारेपन को आज
कुछ परवाह भी थी...
लड़खड़ाते होंठ पर 
आवाज़ गहराती हुई
पहले न देखी...
 
शाम...
यूँ ठहरी हुई...
पहले न देखी...


आज
बंजारन हवा
मुझ तक न आई...
आज
मन के पट पे
इक दस्तक न आई ..
यूँ धुंध में लिपटे जमीं पर
आग लहराती हुई
पहले न देखी ...

 
शाम...
यूँ ठहरी हुई...
पहले न देखी...


- ऋषि चन्द्र 

Tuesday, November 6, 2012

यूँ ही गुनगुनाते हैं  


 पिघलते लौह पर
जो पाँव हैं
रीसते चुभते हुए
जो घाव हैं
जब हद गुज़रते हैं 
तब गुदगुदाते हैं ...

कंठ इन सपनो के
जलते लाश में
इक बूँद को तरसे हुए  ही
प्यास में
जब सूख जाते हैं
तब मुस्कुराते हैं ...


बस एक तेरी चाह
में नूर-ए-ग़ज़ल
हर राह-ए-मैखाने में
दिल हो कर कतल
जब हार जाते हैं
यूँ  ही गुनगुनाते हैं  ...


-ऋषि चन्द्र 

Saturday, September 22, 2012

क्या पूछते हो?

जब  बे-इरादे  हम यहाँ तक आ गए हैं
तो अब भला हम से सफ़र क्या पूछते हो
वो सब मिला हम को के जो तुमने दिया है
मेरी रज़ा  इस हाल में क्या पूछते हो?

दुनिया समझ कर भी नहीं समझी हमें तो  
मेरे नज़रिए हाल तुम क्या पूछते हो
हो भी गया, अब देख ली सारी खुदाई
वापिस बुलाने की वजह क्या पूछते हो?

Thursday, September 6, 2012


 एक नाज़ुक सा रिश्ता जी रहा है

गुज़रते पलों में 
एक नाज़ुक सा रिश्ता जी रहा है 

खुद ही ख़ुशी बुनता 
दिल की कही सुनता 
खुल कर हवा साँसों से अपने पी रहा है
गुज़रते पलों में 
एक नाज़ुक सा रिश्ता जी रहा है

खुद को बचाने को 
सुन कर जमाने को 
हिम्मत भी करता और डरता भी रहा है 
गुज़रते पलों में 
एक नाज़ुक सा रिश्ता जी रहा है

अंजाम से अंजान 
देखो के ये नादान 
छिप कर कहीं लब  खुद ही अपने सी रहा है 
गुज़रते पलों में 
एक नाज़ुक सा रिश्ता जी रहा है 

Sunday, August 26, 2012

थोड़ा होश है 

इस वक़्त थोडा सा नशा है  और थोडा होश है 
पहली दफा तनहाइयों में लब नहीं खामोश है...

इसलिए गहरा गया शायद अँधेरा रात का 
के अब उसे गुमनाम रहने का नहीं अफ़सोस है 
टूट कर तारा गिरा है इसलिए शायद अभी 
के थकता रहा वो भी सफ़र पे आसमां  में रोज़ है
चुप रहे तो खोलने  को राज़ सब कहने लगे
बोल बैठे तो कहा छोडो अभी मदहोश है 
 इस वक़्त थोडा सा नशा है  और थोडा होश है 
पहली दफा तनहाइयों में लब नहीं खामोश है...

खूबसूरत है सुना है वादियों की वो सुबह 
ले चल मुझे भी उस जहां का रास्ता जिस ओर है  
कितने जमाने हो गए हैं इन गुफाओं में हमें,
क्या पता कितनी बची हाथों में अब ये डोर है,
जो रास्ते हमने चुने उनकी कहानी और थी
न ही किसी से कुछ गिला ना ही हमारा दोष है  
 इस वक़्त थोडा सा नशा है  और थोडा होश है 
पहली दफा तनहाइयों में लब नहीं खामोश है...


-ऋषि चन्द्र 

Wednesday, June 13, 2012

 न बयां राज़ होगा

तेरे कद्रदानों में होंगे फ़रिश्ते
मगर जानशीं ये न अंदाज़ होगा...
मोहब्बत के मारे तो हैं लाख लेकिन
रुसवा भी होकर मुझे नाज़ होगा ....
सराबोर होगा नशे में वो शबनम
न फिर साथ उसके ये अल्फाज़ होगा
रह जाएगी कैद उसकी अदाएं
न छलकेगा मय न बयां राज़ होगा ..

Thursday, May 17, 2012

क्या लिखें कुछ और लिखा ही नहीं जाता
बे - जाम ही ये  होश संभाला नहीं जाता
गम से मेरी यारी नहीं यारों, करें तो क्या 
हँस कर ये  हाल-ए-दिल भी बतलाया नहीं जाता....
 

Wednesday, April 11, 2012

फासलों की ओर चलते हैं कदम रो कर
बिगड़ी बनाने की कसम भी रोज़ खाते हैं
फिर अचानक धमनियों में खून जमता है
और बेतहाशा, लड़खड़ाते, लौट आते हैं ...

Friday, April 6, 2012

चलता जा

पग-पग दो पग हैं साथ तेरे,
क्षण-क्षण हर क्षण अभिलाषी है,
चलता जा मन तू क्या जाने,
क्या क्या तय होना बाँकी है...

क्या हुआ जो सपना उजड़ गया,
क्या हुआ जो साथी बिछड़ गया,
बहते जाने को धारे पर,
बस एक ही तिनका काफी है...
सूरज में इतनी तपिश नहीं,
आंधी में ऐसा वेग नहीं,
अवरुद्ध कर सके राह तेरी,
इच्छा जबतक निश्पापी है...
पग-पग दो पग हैं साथ तेरे,
क्षण-क्षण हर क्षण अभिलाषी है,
चलता जा मन तू क्या जाने,
क्या क्या तय होना बाँकी है...

परवाह न कर उस मंजिल की
जो पहुँच कहीं रुक जाती है,
वो है अनंत तक राह तेरी,
तू केवल उसका राही है...
झंकार नसों में बज उट्ठे,
जग निश्चय देख सिहर उट्ठे,
जब बुझता है तारा-तारा,
तब भोर स्वतः हो जाती है,
पग-पग दो पग हैं साथ तेरे,
क्षण-क्षण हर क्षण अभिलाषी है,
चलता जा मन तू क्या जाने,
क्या क्या तय होना बाँकी है...

-ऋषि चन्द्र

Sunday, April 1, 2012

ऐसा भी लगता है कभी

ऐसा भी लगता है कभी, बेचैन जब होता हूँ मैं,
जैसे के कुछ खाली सा है, जैसे के कुछ हारा हूँ मैं...

ये चोट शायद इस दफा, गहरी सी है,
अंजान सी इक टीस है, चुभती भी है,
कुछ घुट गया अन्दर ही अन्दर तो भले,
पर मूक मन सब चीखकर कहती भी है...

भ्रम तो नहीं कुछ भी, मगर, रह रह के खो जाता हूँ मैं,
ठहराव है हर ओर, पर, मन से ही बंजारा हूँ मैं...
ऐसा भी लगता है कभी, बेचैन जब होता हूँ मैं,
जैसे के कुछ खाली सा है, जैसे के कुछ हारा हूँ मैं...

-ऋषि चन्द्र

Thursday, February 9, 2012

मैं वक़्त का अगला पहर

मैं वक़्त का अगला पहर
सुन तेरी बेहोशी को ले आगोश में
कसता हुआ हुंकार भरता हूँ
हर परत चेहरे से तेरे खींच कर
तेरा भरम बेकार करता हूँ
अविराम रथ ले कर शपथ की ओर
अपने सारथी के साथ जाता हूँ
झूठ के हर सेज को सच की
निशानी के हवाले छोड़ जाता हूँ
शंख की अंतिम ध्वनि पर भी
भुजाओं को सबल मैं ही बनाता हूँ
विश्वास धारण कर तुझे क्षण क्षण
विजयपथ पर समर्पण कर बताता हूं...


मैं वक़्त का अगला पहर
सुन तेरी बेहोशी को ले आगोश में
कसता हुआ हुंकार भरता हूँ ...

-ऋषि चन्द्र

Wednesday, January 11, 2012

मिट्टी

मैं मिट्टी के छोटे छोटे
दो गोले गाँव से लाया हूँ
जब जब व्याकुल मन रोया है
मैं उसे चूमता आया हूँ

रात मिले दिन भी आए
इस राह पे यूँ चलते चलते
बरसों बीते देख सका मैं
सूरज को उगते ढलते
ना चला रास्ते चुन चुन कर
ना लिपट किसी से पाया हूँ
ना झूमा पेड़ की टहनी से
ना तोड़ कोई फल खाया हूँ
मैं मिट्टी के छोटे छोटे
दो गोले गाँव से लाया हूँ
जब जब व्याकुल मन रोया है
मैं उसे चूमता आया हूँ


उस पीली धुप में पीपल के
वो छांव भूले जाते हैं
उस नदिया में मछुवारों के
वो नाव भूले जाते हैं
ना नंगे पाँव चला फिर से
ना मैला मैं हो पाया हूँ
ना रूठ के घर से भागा फिर
ना भूखा ही रह पाया हूँ
मैं मिट्टी के छोटे छोटे
दो गोले गाँव से लाया हूँ
जब जब व्याकुल मन रोया है
मैं उसे चूमता आया हूँ......


- ऋषि चन्द्र