पहले न देखी
शाम...
यूँ ठहरी हुई...
पहले न देखी...
मुस्कराहट थी
तो माथे पर शिकन भी...
आवारेपन को आज
कुछ परवाह भी थी...
लड़खड़ाते होंठ पर
तो माथे पर शिकन भी...
आवारेपन को आज
कुछ परवाह भी थी...
लड़खड़ाते होंठ पर
आवाज़ गहराती हुई
पहले न देखी...
पहले न देखी...
शाम...
यूँ ठहरी हुई...
पहले न देखी...
आज
बंजारन हवा
मुझ तक न आई...
आज
मन के पट पे
इक दस्तक न आई ..
यूँ धुंध में लिपटे जमीं पर
आग लहराती हुई
पहले न देखी ...
आज
बंजारन हवा
मुझ तक न आई...
आज
मन के पट पे
इक दस्तक न आई ..
यूँ धुंध में लिपटे जमीं पर
आग लहराती हुई
पहले न देखी ...
शाम...
यूँ ठहरी हुई...
पहले न देखी...
- ऋषि चन्द्र