Tuesday, November 6, 2012

यूँ ही गुनगुनाते हैं  


 पिघलते लौह पर
जो पाँव हैं
रीसते चुभते हुए
जो घाव हैं
जब हद गुज़रते हैं 
तब गुदगुदाते हैं ...

कंठ इन सपनो के
जलते लाश में
इक बूँद को तरसे हुए  ही
प्यास में
जब सूख जाते हैं
तब मुस्कुराते हैं ...


बस एक तेरी चाह
में नूर-ए-ग़ज़ल
हर राह-ए-मैखाने में
दिल हो कर कतल
जब हार जाते हैं
यूँ  ही गुनगुनाते हैं  ...


-ऋषि चन्द्र 

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