यूँ ही गुनगुनाते हैं
पिघलते लौह पर
जो पाँव हैं
रीसते चुभते हुए
जो घाव हैं
जब हद गुज़रते हैं
तब गुदगुदाते हैं ...
कंठ इन सपनो के
जलते लाश में
इक बूँद को तरसे हुए ही
प्यास में
जब सूख जाते हैं
तब मुस्कुराते हैं ...
बस एक तेरी चाह
में नूर-ए-ग़ज़ल
हर राह-ए-मैखाने में
दिल हो कर कतल
जब हार जाते हैं
यूँ ही गुनगुनाते हैं ...
-ऋषि चन्द्र
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