Monday, November 19, 2012

 
पहले न देखी 
 
शाम...
यूँ ठहरी हुई...
पहले न देखी...

मुस्कराहट  थी
तो माथे पर शिकन भी...
आवारेपन को आज
कुछ परवाह भी थी...
लड़खड़ाते होंठ पर 
आवाज़ गहराती हुई
पहले न देखी...
 
शाम...
यूँ ठहरी हुई...
पहले न देखी...


आज
बंजारन हवा
मुझ तक न आई...
आज
मन के पट पे
इक दस्तक न आई ..
यूँ धुंध में लिपटे जमीं पर
आग लहराती हुई
पहले न देखी ...

 
शाम...
यूँ ठहरी हुई...
पहले न देखी...


- ऋषि चन्द्र 

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