अच्छा लगता है
अपने ही दिल से दगा पाना
अच्छा लगता है
तेरी आँखों से यूँ ठगा जाना
तेरी आँखों से यूँ ठगा जाना
अच्छा लगता है
नूर शायर की ग़ज़ल में
क़ैद होता है मगर
कैदी का फिर-फिर निकल जाना
अच्छा लगता है
दूरी का तुझसे ग़म निभाना
अच्छा लगता है
अच्छा लगता है
तुझे देख कर मन बदल जाना
अच्छा लगता है
जिंदगी गिरते संभलते
गुज़र जाती है मगर
इस दौड़ में यूँ वहम खाना
अच्छा लगता है
यूँ ही कभी तुझको हँसाना
अच्छा लगता है
रूठे जो तू, तुझको मनाना
अच्छा लगता है
अच्छा लगता है
बातें बनाने से महज
दिल ही बहलता है मगर
तुझसे यु ही बातें बनाना
अच्छा लगता है
-ऋषि चन्द्र
-ऋषि चन्द्र
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