नासमझ को है समझ की तासीर हो आई
ये लगता है अभी इक दौड़ से गुज़रे चले आए ...
इस भीड़ में हम मिल गए खुद से अचानक ही
मुद्दत हुए जब घर से हम जंगल चले आए ...
कोर में हमने नमी रखी थी थोड़ी सी
अभी लगता है जैसे आँख के शीशे बदल आये ...
कहाँ ले जाएगी अब वक़्त की मनहूसियत उनको
जो अपनी दास्ताँ पन्नो से हैं खुद ही मिटा आये…
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