Thursday, May 9, 2013



तुम  राज़  हो  कोई

मधुमय  सुराही  सी  ढली  आवाज़  हो  कोई
या  कोहिनूरी  सी  चमकती  नाज़  हो  कोई
तुम  हो  अजंता  की  कला  या  ताज  तुम  ही  हो
गुमराह  हू मैं, अनकही  तुम राज़  हो  कोई...

तुम  राज़  हो  कोई ...तुम  राज़  हो  कोई ...


पूर्णमासी  की  विभा  सी  तुम  बरसती  हो
या  चौदवी  के  रात  की  हो  चन्द्रमा  कोई
बारिश  के  रिमझिम  से  उठी  माटी की  वो  खुशबू
या  कन्हैया  की  सुरीली  बांसुरी  कोई
तुम  सुबह  की  वंदना  में  गा  रही  वीना
या  सांझ  के  दीपक  की  टिमटिम  रौशनी  कोई
अटखेलियाँ  करती  हुई  बहती  बसंती  हो
या  आठवें  सुर  में  सजी  तुम  साज़  हो  कोई ...

तुम  राज़  हो  कोई ...तुम  राज़  हो  कोई ...


तुम  कली  हो  ओस  की  बूंदों  के  चादर  में
या  के  सुन्दरता  की  परिभाषा  तुम्ही  तुम  हो
गंगा  हो  तुम  यमुना  हो  या  संगम  हो  तुम  कोई
या  के  देवों  की  कठिनतम  साधना  कोई
तुम  कवी  के  कल्पना  विस्तार  का  झरना
या  के  हर  श्रिंगार  का  तुम  ही  समागम  हो
गुर  से  भी  मीठी  हो  जो  इमली  से  भी  हो  खट्टी
चंचल  नयी  दुल्हन  का  ऐसा  लाज  हो  कोई...

तुम  राज़  हो  कोई ...तुम  राज़  हो  कोई ...

गागर  भरे  पनघट  पे  हँसती  राधिका  रानी
या  राम  के  रघुकुल  की  मर्यादा  हो  तुम  कोई
माँ  की  ममतामय  सजल  आँखों  की  धारा हो
हो  मेरी  श्रद्धा  तुम्ही  तुलसी  हो  आँगन  की
तुम  धरा  नभ  वायु  जल  भी  और  ज्वाला  भी
या  सकल ब्रह्माण्ड  की  तुम  स्वामिनी  कोई
गजगामिनी  मनोहारिणी  तेजस्विनी  माया !
तुम मेरे  मर्ज़--मौत  का  इलाज़  हो   कोई...
गुमराह  हू मैं, अनकही  तुम राज़  हो  कोई...

तुम  राज़  हो  कोई ...तुम  राज़  हो  कोई ...

1 comment:

  1. Likhte Likhte raah bhi milegi, aur app ki ye shradha appko pavitra bhi karegi !

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