Thursday, September 29, 2011

पतली  गली  से

दुकानों  में  यूँ  आग  लगते  रहे  तो 
लकरी  कुतर   के  भी  खाना  पड़ेगा  
पानी  को  वाटर  न  कह  कह  के  बेचो 
के  नाली   में  गोता   लगाना  पड़ेगा 
खुले  चोंच   कितने  हैं  दाने  मगर  दो 
रिश्ता  भी  उसमे  निभाना  पड़ेगा 
ठसमठस है  चारों  तरफ  हाल   भैया  
के  पतली  गली  से  ही  जाना  पड़ेगा 

कभी  शौकिया   भी  जो  बाज़ार  निकले ,
खरे  रोंगटों  को  सुलाना  पड़ेगा ,
खातिर  की  ज्यादा  तलब  जो  हुई  तो ,
नंगे  बदन  मार  खाना  पड़ेगा ,
कल  रात  खम्भे  से  जोड़ा   था  टांका ,
फिर  से  किसी  को  चढ़ाना  पड़ेगा ,
ठसमठस है  चारों  तरफ  हाल   भैया  
के  पतली  गली  से  ही  जाना  पड़ेगा


अगर  यार  की  याद आने  लगेगी ,
तो  बटुआ  वो  पहले  छुपाने  लगेगा ,
के  लगता  है  अब  भीख  देने  के  बदले ,
भिखारी  का  डब्बा  उड़ाना  पड़ेगा ,
इंजन  बिना  तो  चले  ही  थे  पैदल ,
अब  इंधन  का  खर्चा  बचाना  पड़ेगा 
ठसमठस है  चारों  तरफ  हाल   भैया  
के  पतली  गली  से  ही  जाना  पड़ेगा...  


कर  देंगे  घटना  कोई  दिन  दहाड़े,
गुज़ारे  का  मुमकिन  बहाना  मिलेगा 
लगा  हथकड़ी  ले  के  जाएँ  बड़े  घर ,
तो फ़ोकट का खाना खज़ाना  मिलेगा ,
कब तक युं ही नल की टप टप चलेगी,
बूंदों से कब तक नहाना पड़ेगा,
ठसमठस है  चारों  तरफ  हाल   भैया  
के  पतली  गली  से  ही  जाना  पड़ेगा


लकीरों  के  बदले  दरारें  बनी  हो ,
तो ज्योतिष को भी सिर झुकाना पड़ेगा,
कहे भी तो क्या चन्द्र, जब हाल ये है,
के ग़म भी हँसा के सुनाना पड़ेगा,
तुम्हे तो सुना ही दी अपनी कविता ,
अब  नया  कोई  मुर्गा  फ़साना  पड़ेगा,
ठसमठस है  चारों  तरफ  हाल   भैया  
के  पतली  गली  से  ही  जाना  पड़ेगा


- ऋषि चन्द्र 











Monday, September 5, 2011

साँसों के चलने के लिए

फूलों से रंजिश हो गई,
पर बदनसीबी देखिये,
दरकार खुशबू की रही,
साँसों के चलने के लिए...

नियत की भी पहचान
ऐ रश्म-ऐ-मोहब्बत देखते,
भँवरों से रिश्ता कर लिया,
पत्तों को जलता छोड़ के,
धोखे ही धोखे बाग़ में,
हर पौध में, हर डाल में,
खुश है मेरा दिल आज उन,
दश्तों के बंजर के लिए...
फूलों से रंजिश हो गई,
पर बदनसीबी देखिये,
दरकार खुशबू की रही,
साँसों के चलने के लिए...

रौशनी तो रौशनी,
अंधेरों में भी खिल रहे,
जो हैं नहीं दिल के जले,
महफूज़ वो कैसे रहे,
देखे हैं बस्ती में कई,
चिंगारियां उड़ते हुए,
पूछोगे ज़न्नत का पता,
कह देंगे मरने के लिए...
फूलों से रंजिश हो गई,
पर बदनसीबी देखिये,
दरकार खुशबू की रही,
साँसों के चलने के लिए...

काफिर कहा,पागल कहा,
कितनी महारथ मिल गई,
मंजिल बिना ही रास्तों की,
शहंसाहत मिल गई,
मुझसे हवाओं ने कहा,
ऐ हमसफ़र, तू कौन है?
मैंने कहा के, साथ चल,
पहचान करने के लिए...
फूलों से रंजिश हो गई,
पर बदनसीबी देखिये,
दरकार खुशबू की रही,
साँसों के चलने के लिए...

ऐ फूल तेरे रंग का,
ये ढंग कैसा है बता,
छिल गई चमरी मगर,
उतरा नहीं जो चढ़ गया,
ये खेल इतनी दूर तक,
लाकर, हराया क्यूँ मुझे,
जब एक ही थी चाल काफी,
मात करने के लिए...
फूलों से रंजिश हो गई,
पर बदनसीबी देखिये,
दरकार खुशबू की रही,
साँसों के चलने के लिए...

-ऋषि चन्द्र

Sunday, September 4, 2011

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ

आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्म-ओ-रहे दुनिया ही नीभाने के लिए आ
किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से खफा है तो ज़माने के लिए आ
कुछ तो मेरे पिन्दार-ऐ-मुहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ
एक उम्र से हूँ लज्ज़त-ऐ-गिरिया से भी महरूम
ऐ राहत-ऐ-जान मुझ को रुलाने के लिए आ
अब तक दिल-ऐ-खुशफहम को तुझ से हैं उम्मीदें
ये आखिरी शम्में भी बुझाने के लिए आ
माना की मुहब्बत का छिपाना है मुहब्बत
चुपके से किसी रोज़ जताने के लिए आ
जैसे तुझे आते हैं न आने के बहाने
ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए

-
अहमद फ़राज़