Monday, September 5, 2011

साँसों के चलने के लिए

फूलों से रंजिश हो गई,
पर बदनसीबी देखिये,
दरकार खुशबू की रही,
साँसों के चलने के लिए...

नियत की भी पहचान
ऐ रश्म-ऐ-मोहब्बत देखते,
भँवरों से रिश्ता कर लिया,
पत्तों को जलता छोड़ के,
धोखे ही धोखे बाग़ में,
हर पौध में, हर डाल में,
खुश है मेरा दिल आज उन,
दश्तों के बंजर के लिए...
फूलों से रंजिश हो गई,
पर बदनसीबी देखिये,
दरकार खुशबू की रही,
साँसों के चलने के लिए...

रौशनी तो रौशनी,
अंधेरों में भी खिल रहे,
जो हैं नहीं दिल के जले,
महफूज़ वो कैसे रहे,
देखे हैं बस्ती में कई,
चिंगारियां उड़ते हुए,
पूछोगे ज़न्नत का पता,
कह देंगे मरने के लिए...
फूलों से रंजिश हो गई,
पर बदनसीबी देखिये,
दरकार खुशबू की रही,
साँसों के चलने के लिए...

काफिर कहा,पागल कहा,
कितनी महारथ मिल गई,
मंजिल बिना ही रास्तों की,
शहंसाहत मिल गई,
मुझसे हवाओं ने कहा,
ऐ हमसफ़र, तू कौन है?
मैंने कहा के, साथ चल,
पहचान करने के लिए...
फूलों से रंजिश हो गई,
पर बदनसीबी देखिये,
दरकार खुशबू की रही,
साँसों के चलने के लिए...

ऐ फूल तेरे रंग का,
ये ढंग कैसा है बता,
छिल गई चमरी मगर,
उतरा नहीं जो चढ़ गया,
ये खेल इतनी दूर तक,
लाकर, हराया क्यूँ मुझे,
जब एक ही थी चाल काफी,
मात करने के लिए...
फूलों से रंजिश हो गई,
पर बदनसीबी देखिये,
दरकार खुशबू की रही,
साँसों के चलने के लिए...

-ऋषि चन्द्र

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