Sunday, August 26, 2012

थोड़ा होश है 

इस वक़्त थोडा सा नशा है  और थोडा होश है 
पहली दफा तनहाइयों में लब नहीं खामोश है...

इसलिए गहरा गया शायद अँधेरा रात का 
के अब उसे गुमनाम रहने का नहीं अफ़सोस है 
टूट कर तारा गिरा है इसलिए शायद अभी 
के थकता रहा वो भी सफ़र पे आसमां  में रोज़ है
चुप रहे तो खोलने  को राज़ सब कहने लगे
बोल बैठे तो कहा छोडो अभी मदहोश है 
 इस वक़्त थोडा सा नशा है  और थोडा होश है 
पहली दफा तनहाइयों में लब नहीं खामोश है...

खूबसूरत है सुना है वादियों की वो सुबह 
ले चल मुझे भी उस जहां का रास्ता जिस ओर है  
कितने जमाने हो गए हैं इन गुफाओं में हमें,
क्या पता कितनी बची हाथों में अब ये डोर है,
जो रास्ते हमने चुने उनकी कहानी और थी
न ही किसी से कुछ गिला ना ही हमारा दोष है  
 इस वक़्त थोडा सा नशा है  और थोडा होश है 
पहली दफा तनहाइयों में लब नहीं खामोश है...


-ऋषि चन्द्र 

1 comment:

  1. intaaa Khubsurat.... itna khubsoorat hai ki shabd bhi nahi mil rahe tareef karne ko.... Can just say my good wishes are always with you.

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