मैं वक़्त का अगला पहर
मैं वक़्त का अगला पहर
सुन तेरी बेहोशी को ले आगोश में
कसता हुआ हुंकार भरता हूँ
हर परत चेहरे से तेरे खींच कर
तेरा भरम बेकार करता हूँ
अविराम रथ ले कर शपथ की ओर
अपने सारथी के साथ जाता हूँ
झूठ के हर सेज को सच की
निशानी के हवाले छोड़ जाता हूँ
शंख की अंतिम ध्वनि पर भी
भुजाओं को सबल मैं ही बनाता हूँ
विश्वास धारण कर तुझे क्षण क्षण
विजयपथ पर समर्पण कर बताता हूं...
मैं वक़्त का अगला पहर
सुन तेरी बेहोशी को ले आगोश में
कसता हुआ हुंकार भरता हूँ ...
-ऋषि चन्द्र
मैं वक़्त का अगला पहर
सुन तेरी बेहोशी को ले आगोश में
कसता हुआ हुंकार भरता हूँ
हर परत चेहरे से तेरे खींच कर
तेरा भरम बेकार करता हूँ
अविराम रथ ले कर शपथ की ओर
अपने सारथी के साथ जाता हूँ
झूठ के हर सेज को सच की
निशानी के हवाले छोड़ जाता हूँ
शंख की अंतिम ध्वनि पर भी
भुजाओं को सबल मैं ही बनाता हूँ
विश्वास धारण कर तुझे क्षण क्षण
विजयपथ पर समर्पण कर बताता हूं...
मैं वक़्त का अगला पहर
सुन तेरी बेहोशी को ले आगोश में
कसता हुआ हुंकार भरता हूँ ...
-ऋषि चन्द्र
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