Tuesday, August 2, 2011

शायरी

हो गए नाराज़ वो, और न मिले हमको कभी,
बस ढूँढ़ते और घूमते, हमने गंवाई जिंदगी,
माखौल गलियों में उड़े, चुभने लगी कितनी हँसी,
फिर थामकर, दर्द-ऐ-जिगर, करने लगे हैं शायरी...

धूप में जलना ही बेशक, अब मेरी पहचान है,
शाम ढल जाये कभी, इक बार, ये अरमान है,
कहते हैं, खुद ही ढून्ढ लेती है किनारे जिंदगी,
पर जिंदगी भी बेवफा, दो पल कि तो मेहमान है...
बेखबर इस बात से, मंजिल है लुट जाना मेरी,
थामकर , दर्द-ऐ-जिगर , करने लगे हैं शायरी...

एहसान पर एहसान मुझपर, कर रहे कितने सभी,
ये क्या दिलासे हैं के, दिल को फर्क ही पड़ता नहीं,
कितने पतंगे जल गए हैं, छू के ये रौशन दिए,
अपनी कहानी भी जुदा, उनसे, जियादा है नहीं...
हम जानकार अनजान को, कर बैठे ऐसी दिल्लगी,
के थामकर, दर्द-ऐ-जिगर, करने लगे हैं शायरी...

-ऋषि चन्द्र

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