ढूंढता है
ठिकाना कोई ये सफ़र ढूँढता है,
वो हाथों से फिसले पहर ढूँढता है,
हर मंजर है रौशन ही रौशन, मगर,
ये अँधेरा उजालों में घर ढूँढता है।
वो यारों की बैठक, वो कुछ प्याली चाय,
वो पागल सा हँसने का मन ढूँढता है,
बहन बांधे राखी, मिले गोद माँ की,
खुदाई का इतना महर ढूँढता है।
वो छुपना-छुपाना, वो तितली उड़ाना,
वो साइकिल चलाने के दिन ढूँढता है,
वो बारिश का पानी, हवाओं कि हलचल,
वो कश्ती बनाने के पल ढूँढता है।
ज़िन्दगी, तुझसे कोई शिकायत नहीं है,
मगर दिल ये थोड़ा, अदब ढूँढता है,
अजब है कहानी, तेरी भी मेरी भी,
मैं तुझमे, तु मुझमे, कसर ढूँढता है।
- ऋषि चन्द्र
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