जिन्दादिली
दर से तुम्हारे जो रुख्सत न होते,
तो मिलने के तुमसे ये मकसद न होते,
नया फिर सवेरा भला कैसे होता,
ठहरते अगर ये अँधेरे न होते।
पता रास्तों का न होता हमें जो
कभी राह पर यूँ अकेले न चलते,
मोहब्बत न होती, वफ़ा न निभाते,
कभी दर्दे - दिल जो उठाये न होते।
यूँ ही दूर तक जिंदगी के सफ़र में,
कई हैं मिले तो कई छूट जाते,
न दिल पे वो ऐसी मुहर ठोक जाते,
न यूँ बेकदर वो हमें याद आते।
हँसी होंठ पे, आँख में कुछ नमी है,
वो ग़म पी गए इसलिए ये ख़ुशी है,
सहारा जो सपनो का होता न हमको,
न जिन्दादिली का मजा ढूँढ पाते।
- ऋषि चन्द्र
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