Tuesday, August 23, 2011

काश!

फिर से तलाश करता मंजिल,
फिर से राहें ढूँढा करता,
इक रोज़ कहीं चलते चलते,
काश! अगर मैं खो जाता...

काश! के मेरे हाथों से,
कुछ बनी लकीरें मिट जाती,
काश! के मेरे माथे की,
ये शिकन कहीं जा छिप जाती,
जो दफन हो गया है मुझमे,
वो राज़ उजागर हो जाता,
इक रोज़ कहीं चलते चलते,
काश अगर मैं खो जाता...


काश! वक़्त फिर से चुनाव का,
अवसर मुझको दे देता,
काश! वो सपने आँखों में,
मैं छीन के फिर से ले आता,
आज़ाद समंदर के रस्ते,
तालाब का पानी चल पड़ता,
इक रोज़ कहीं चलते चलते,
काश अगर मैं खो जाता...

फिर से तलाश करता मंजिल,
फिर से राहें ढूँढा करता,
इक रोज़ कहीं चलते चलते,
काश अगर मैं खो जाता...

- ऋषि चन्द्र

2 comments:

  1. The link of this blog was given to me by an unknown person.... and after reading this I really feel so lucky to be the part of ur blog...
    Bahut dino baad bahut achchi kavitain padhin.... really amazing.... keep it up... GOD BLESS

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  2. thnku ji....n its so gud 2 see u here...welcm...who gav u d link?...i mst also thnk him/her...hehe...

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