घर तो हो...
तबाह क्या करे, जो खुदाया से न वो माँगे
के रेहमत पर यकीन रखे, मगर कोई असर तो हो…
मायूसियों के सिलसिले बस ये बयां कर दे…
सच्ची इबादत किसलिए? कुछ खोने का डर तो हो.…
प्यासा क्या करे, अगर बंजर में ना चले
हो के बेहोश गिर जाए, कोई राहत का दर तो हो…
ऎ दूर तक फैली हुई वीरानियाँ कह दे
मेरा ठिकाना किस जगह? कोई अपना सा घर तो हो..
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