जाग उठो
प्रति कर्म के यदि सचेत जो, न हो पाओगे तुम आज ,
फ़िर भविष्य से आँख मिलाते, डूब मरोगे मारे लाज ।
है आह्वान नव पीढ़ी से, गुंजित कर बिगुलों का साज,
जाग उठो ऐ कर्मवीर , मैं तुमको देता हूँ आवाज ।
है सहज नहीं अगणित वर्षों तक, बेरी में जकड़ा जाना,
तोप के गोलों को छाती पर, गेंद समझ सहते जाना।
दब जाते थे चीख सुना है, गोली की बौछारों में ,
वो होली थी खून की जिसमे, आजादी हमने जाना।
है स्पर्श,मर्म का लेकिन, रोना कापुरुषों का काज,
जाग उठो ऐ कर्मवीर , मैं तुमको देता हूँ आवाज।
है कर्ज तुम्हारे ऊपर मेरा, रंग लहू का कहता है,
है यही वक्त है यही उम्र, जब भाग्य अधूरा लगता है।
अम्बर अभेद्य है पत्थर से, तुम कहो कौन ये कहता है,
तो जलो आग में, और जलो, तप-तप कर सोना बनता है।
तुम चढो गगन में सूरज सा, कर दो आलोकित यह समाज,
जाग उठो ऐ कर्मवीर , मैं तुमको देता हूँ आवाज।
- ऋषि चंद्र
jaise-jaise main aapki kavita padhata hun main aapke kavita ka fan banta ja raha hun. man karta hai ek aur kavita padhun.
ReplyDelete-vijay