कवितायेँ अति मधुर एवं प्रेरित करने वाली होती हैं। हिन्दी भाषा हमारे सबसे नजदीक है, अतः यह हमारे अंतर्मन को प्रभावित करती है। हिन्दी कविताओं के प्रति वर्तमान पीढी सजग नही है, यह दुखजनक है, वरण यह उनकी गलती भी नही है। पाश्चात्य सभ्यता के विस्तार एवं वैश्विकरण ने निस्संदेह प्रगति के मार्गों को उजागर तो किया, वरण निज सभ्यता, विचार, एवं भाषाओं का हनन भी किया है। यह तो सम्भव नही हो सकता के व्यक्तिगत विचारों को बदला जा सके परन्तु हिन्दी की प्रतिष्ठा, एवं साहित्य की रक्षा और प्रोत्साहन की नैतिक जिम्मेदारी का आभास हमें करना चाहिए ।
धन्यवाद्
- ऋषि चंद्र
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