ज़ात पियक्कड़ वाली है
तुम दिन की क्या बतलाते हो ?
हर रोज़ यहाँ दीवाली है,
मैं दुनिया को उल्टा देखूं,
मेरी ज़ात पियक्कड़ वाली है|
मुझसे बाज़ी न खेल सनम,
तेरे बादशाह का मोल नहीं,
मुझे अँधा न समझे कोई,
मदहोश हु मैं, बेहोश नहीं|
गोरा भी नहीं काला भी नहीं,
मेरी रंगत खालिस लाली है,
मेरा भेद मिट गया दुनिया से,
मेरी ज़ात पियक्कड़ वाली है||
तुम सभ्य पुरुष कहलाते हो,
क्या तुम में कोई दोष नहीं?
तुम्हें अपनों की बर्बादी का,
होता कोई अफ़सोस नहीं?
हाँ, रात तो काली होती है,
पर दिन क्यूँ इतनी काली है?
मेरी नज़रें देख रहीं दुनिया,
मेरी ज़ात पियक्कड़ वाली है||
हर रात अकेले जगता हूँ,
हर सुबह अँधेरा ढंकता हूँ,
कभी सन्नाटा मुझको खाता,
कभी मैं उसको खा जाता हूँ|
धू-धू कर के, एक वृक्ष जला,
ना बाग़ ना कोई माली है,
मेरी नस-नस नशे की है बस्ती,
मेरी ज़ात पियक्कड़ वाली है||
-ऋषि चन्द्र
तुम दिन की क्या बतलाते हो ?
हर रोज़ यहाँ दीवाली है,
मैं दुनिया को उल्टा देखूं,
मेरी ज़ात पियक्कड़ वाली है|
मुझसे बाज़ी न खेल सनम,
तेरे बादशाह का मोल नहीं,
मुझे अँधा न समझे कोई,
मदहोश हु मैं, बेहोश नहीं|
गोरा भी नहीं काला भी नहीं,
मेरी रंगत खालिस लाली है,
मेरा भेद मिट गया दुनिया से,
मेरी ज़ात पियक्कड़ वाली है||
तुम सभ्य पुरुष कहलाते हो,
क्या तुम में कोई दोष नहीं?
तुम्हें अपनों की बर्बादी का,
होता कोई अफ़सोस नहीं?
हाँ, रात तो काली होती है,
पर दिन क्यूँ इतनी काली है?
मेरी नज़रें देख रहीं दुनिया,
मेरी ज़ात पियक्कड़ वाली है||
हर रात अकेले जगता हूँ,
हर सुबह अँधेरा ढंकता हूँ,
कभी सन्नाटा मुझको खाता,
कभी मैं उसको खा जाता हूँ|
धू-धू कर के, एक वृक्ष जला,
ना बाग़ ना कोई माली है,
मेरी नस-नस नशे की है बस्ती,
मेरी ज़ात पियक्कड़ वाली है||
-ऋषि चन्द्र
haha, nice post. though im nt piyakkad :P
ReplyDelete"हर रात अकेले जगता हूँ,
ReplyDeleteहर सुबह अँधेरा ढंकता हूँ,
कभी सन्नाटा मुझको खाता,
कभी मैं उसको खा जाता हूँ|
धू-धू कर के, एक वृक्ष जला,
ना बाग़ ना कोई माली है"
खूब कही - ज़ात पियक्कड़ वाली - अच्छी लगी
mujhe andha na samjhe koi,mad hos hun mai,behos nahin. achchhi kavita hai.
ReplyDeleteबहुत अच्छा !
ReplyDeleteनए हिंदी ब्लाग के लिए बधाइयाँ और स्वागत। उत्तम लेखन है… लिखते रहिए। अन्य ब्लागोँ पर भी जाइए जिनमें मेरे ब्लाग भी हैं…
ReplyDeleteवास्तव में कुछ अच्छा पढने को मिला
ReplyDeletekavita to achchi hain........har vyakti ki alag soch hoti hai.,,....aur mukhe lagta hain ki apne par dukh aur duniya par krodh vyakta kiya gaya hain.....kavi -ऋषि चन्द्र ji ki kavita ki ye panktiya vishesh taur par pasand aaeen
ReplyDeleteतुम सभ्य पुरुष कहलाते हो,
क्या तुम में कोई दोष नहीं?
तुम्हें अपनों की बर्बादी का,
होता कोई अफ़सोस नहीं?
हाँ, रात तो काली होती है,
पर दिन क्यूँ इतनी काली है?
मेरी नज़रें देख रहीं दुनिया,
मेरी ज़ात पियक्कड़ वाली है||
sabhi ko saprem dhanyawaad...aage bhi isi prakar aapka manoranjan karne ka prayas karunga...@piyush:meri koshish is prakar thi ke maine sansar ko ek andhe ki,ek paapi ki aankhon se dekhna chaha hai jo sansar dwara hi is gati ko prapt karta hai...parantu woh bhi swayam ko is mahatwakanshi aur bhogwilasi sansar se adhik neech nahi samajhta...piyakkad shabd ek rupak hai...
ReplyDeleteहिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
ReplyDeleteकृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें